भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ८ ] शारीरस्थानम् १२३ से अन्य बाहर निकलने वाले वायु, मूत्र, मल भी अन्दर रुक जाते हैं। वे आस्थापन से बाहर आ जाते हैं ॥ ४४ ॥ तस्यास्तु खल्वपरायाः प्रपतनार्थं कर्मणि क्रियमाणे जातमात्रे- ऽस्यैव कुमारस्य कार्याण्येतानि कर्माणि भवन्ति । तद्यथा—अश्मनोः संघट्टनं कर्णयोर्मूले, शीतादकेनोष्णोदकेन वा मुखेन परिषेकः, तथा संक्लेशविहतान् प्राणान् पुनर्लभेत, कृष्णकपालिकाशूर्पेण चैनमभिनि- ष्पुनीयुर्यद्यचेष्टः स्याद्यावत्प्राणानां प्रत्यागमनं ततः प्रत्यागतप्राणं प्रकृतिभूतमभिसमीक्ष्य स्नानोदकग्रहणाभ्यामुपपादयेत् । अपरा को गिराने के लिये उपयुक्त कर्म करते हुए उत्पन्न हुए बच्चे के निम्न कार्य करने योग्य होते हैं यथा—कानों के पास म [ श्रवण शक्ति को जागृत करने के लिये ] पत्थरों को बजाना । ऋतु भेद से गरमियों मे शीतल जल से, सरदियों मे गरम जल से स्नान कराना चाहिये । इस प्रकार करने से योनिच्छिद्र में से आने के कारण पीड़ित क्लेश अनुभव करने वाले प्राणों को पुनः सुख प्राप्त कराता है। यदि शिशु चेष्टारहित हो तो इस को सींक से बने छाज से हवा करनी चाहिये, जब तक कि श्वास न आजाये। श्वास आने पर तथा स्वस्थ अवस्था मे देख कर उसको स्नान कराना तथा उसके मलमार्ग स्वच्छ करने चाहिये । अथास्य ताल्वोष्ठ-कण्ठ-जिह्वा-प्रमार्जनमारभेताङ्गुल्या सुपरिलि- खितनखया सुप्राक्षालितोपधान-कार्पास-पिचुमत्या, प्रथमं प्रमार्जितस्य चास्य शिरस्तालु कार्पासपिचुना स्नेहगर्भेण प्रतिच्छादयेत्, ततोऽस्या- नन्तरं कार्यं सैन्धवोपहितेन सर्पिषा प्रच्छर्द्दनम् ॥ ४५ ॥ इस बच्चे के तालु, आठ, कण्ठ, जिह्वा को साफ करना प्रारम्भ करे, इसके लिये जिसके नख कटे हो वह उस से अगुंली धोई हुई स्वच्छ रुई क फाये द्वारा उसे साफ करे, नहाये बच्चे के प्रथम मुख को साफ़ करे और शिरतालु के ऊपर तैल मे भीगे रुई के फाये को रखे। इसके पीछे सैन्धव मे मिले घी के द्वारा वमन करावे जिससे कफ निकल जाये ॥ ४५ ॥ अथ नाड्यास्तस्य कल्पनविधिमुपदेक्ष्यामः—नाभिबन्धनात्प्रभृ- त्यष्टाङ्गुलमभिज्ञानं कृत्वा छेदनावकाशस्य द्वयोरन्तरयोः शनैर्गृहीत्वा तीक्ष्णेन रौक्मराजतायसानां छेदनानामन्यतमेनार्धधारेण छेदयेत्ताम् । अग्रे सूत्रेणोपनिबध्य कण्ठेऽस्य शिथिलमवसृजेत् । तस्य चेन्नाभिः पच्येत, तां लोध्र-मधुक-प्रियङ्गु-देवदारु-हरिद्रा-कल्क-सिद्धेन तैलेनाभ्य-