चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ चरकसंहिता [ अ० ८ क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवर्ज्यानि ग्राम्यानूपौदकानि च शाक-धान्य मांसानि द्रव-मधुराम्ल-भूयिष्ठाश्चाहाराः क्षीरिण्यश्चौषधयः क्षीरपान चानायासश्चेति, वीरण-शालि-षष्टिकेश्रुवालिका-दर्भ-कुश-काश- गुन्द्रेत्कट-मूल कषायाणां च पानमिति क्षीरजननान्युक्तानि ॥ ५८ ॥ दूध-वर्धक पदार्थ-सीधु नामक मद्य को छोड़ कर शेष सब मद्य, ग्राम्य और आनूप देशों मे उत्पन्न शाक, धान्य या मांस, द्रव, मधुर, अम्ल, लवण, बहुत भोजन, दूध-वर्धक ओषधिया, दूध का पान और मेहनत न करना । वीरण, साठी, हेमन्त धान्य, गन्ना, दाभ, कुश, काश गुन्द्रा, इत्कट इनकी जड़ों के कषायों को पिलाना दूध-वर्धक है ॥५८॥ धात्री तु यदा स्वादु-बहुल-शुद्ध-दुग्धा स्यात्तदा स्नातानुलिप्ता शुक्ल वस्त्रं परिधायैन्द्री ब्राह्मी शतवीर्याममोघामव्यथा शिवामरिष्टा वाट्यपुष्पी विष्वक्सेनकान्ता वा बिभ्रत्योषधि कुमारं प्राङ्मुख प्रथम दक्षिण स्तनं पाययेदिति धात्रीकर्म ॥ ५६ ॥ धात्री की नियुक्ति-जिस समय धात्री का दूध बहुत स्वाद, बहुत शुद्ध हो, उस दिन स्नान कराके, चन्दन लगाकर सफेद बस्त्रों को पहिनाकर ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतवीर्या, सहस्रवीर्या, अमोघा, गिलोय, शिरा, वाट्यपुष्पी, अरिष्टा, विष्वक्सेन- कान्ता आदि ओषधियो को धारण कराके, शिशु का शिर पूर्व की ओर करके प्रथम दक्षिण स्तन पीने के लिये देना चाहिये । यह धात्री-कर्म का उपदेश कर दिया है ॥५६॥ अतोऽनन्तरं कुमारागारविधिमनुव्याख्यास्यामः--वास्तु-विद्या- कुशलः प्रशस्तं रम्यमत्तमस्क निवातं प्रवातैकदेश दृढमपगत-श्वापद-पशु दंष्ट्रि-मूषिक पतङ्ग सुसंविभक्त-सलिलोदूखल-मूत्र-वर्चः-स्थान-स्नान- भूमि-महानसमृतुसुख यथर्तुशयनासनास्तरणसंपन्न कुर्यात्तथा सुविहित- रक्षा-विधान-बलि-मङ्गल-होम प्रायश्चित्तं शुचि-वृद्ध-वैद्यानुरक्त-जन-सपू- र्णमिति कुमारागारविधिः ॥ ६० ॥ कुमारागार विधि-इसके आगे कुमारागार विधि का वर्णन करते हैं। मकान की रचना को जानने वाला वास्तुविद्या में कुशल पुरुष उत्तम, सुन्दर, प्रकाशयुक्त, वायुदार ( परन्तु जोर से चारों ओर की वायु न आये ), मजबूत, गाय, बकरी, पशु आदि और बिछी आदि दाढ़ वाले पशु, चूहे, पतंग आदि से रहित, पानी, उलूखल, मूत्रस्थान, मलस्थान, स्नानगृह, रसोई आदि पृथक् पृथक् ऋतु के अनुकूल, ऋतु के अनुसार, बिस्तर आसन, बिछौने से युक्त घर