चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १] इन्द्रियस्थानम् १४१ इति वर्णस्वराधिकारौ यथावदुक्तौ मुमूर्षता ज्ञानार्थमिति ॥१७॥ मरणोन्मुख रोगी के लक्षणों को जानने के लिये वर्ण और स्वर के लक्षण यथावत् कह दिये हैं ॥ १७ ॥ भवन्ति चात्र—यस्य वैकारिको वर्णः शरीर उपजायते । अर्धे वा यदि वा कृत्स्ने निमित्तं न च नास्ति सः ॥ १८ ॥ जिस रोगी के आधे या सम्पूर्ण शरीर मे निमित्त के बिना वैकृतिक वर्ण उत्पन्न हो जाता है तो वह मनुष्य के मरने का लक्षण ही है ॥ १८ ॥ नीलं वा यदि वा श्याव ताम्र वा यदि वाऽरुणम् । मुखार्धमन्यथा वर्णो मुखार्धेऽरिष्टमुच्यते ॥ १६ ॥ जिस रोगी का आधा मुख नीला, काला, ताम्बे के रंग का अथवा लाल रंग का हो जाता है और आधा मुख दूसरे प्रकार का रंग का हो, यह लक्षण मृत्यु का है ॥ १६ ॥ स्नेहो मुखार्धे सुव्यक्तो रौक्ष्यमर्धमुखे भृशम् । ग्लानिरर्धे तथा हर्षो मुखार्धे प्रेतलक्षणम् ॥ २० ॥ यदि मुख के आधे भाग में स्नेह दीखता हो और आधे में रूखता दीखता हो, आधे मुख मे ग्लानि और आधे मुख पर हर्ष के चिह्न हों तो यह मरने वाले के लक्षण हैं ॥ २० ॥ तिलकाः पिप्लवो व्यङ्गा राजयश्च पृथग्विधाः । आतुरस्याशु जायन्ते मुखे प्राणान्मुमुक्षतः ॥ २१ ॥ प्राण त्यागने वाले रोगी के मुख पर तथा मुख के अन्दर तिल, फुन्सी ( पिप्लु ), व्यंग, भिन्न २ प्रकार की रेखायें शीघ्र उत्पन्न होती हैं ॥ २१ ॥ पुष्पाणि नखदन्ते वा पङ्को वा दन्तसश्रितः । चूर्णको वाऽपि दन्तेषु लक्षणं मरणस्य तत् ॥ २२ ॥ जिस रोगी के नख या दातों पर फूल, दातों में मैल और चूर्ण उत्पन्न हो जाता है, यह मरने का लक्षण है ॥ २२ ॥ ओष्ठयोः पादयोः पाण्योरक्षणोर्मूत्र-पुरीषयोः । नखेष्वपि च वैवर्ण्यमेतत्क्षीणबलेऽन्तकूत् ॥ २३ ॥ क्षीण हुए रोगी के ओंठ, पाव हाथ, आख मूत्र और मल तथा नख इनमें रंग परिवर्त्तन होना रोगी का अन्त कर देता है ॥ २३ ॥ यस्य नीलावुभावोष्ठौ पक्व-जाम्बव-सन्निभौ । मुमूर्षुरिति तं विद्यान्नरो धीरो गतायुषम् ॥ २४ ॥