चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५५ स्नातानुलिप्तगात्रेऽपि यस्मिन् गृध्नन्ति मक्षिकाः । स प्रमेहेण संस्पर्शं प्राप्य तेनैव हन्यते ॥ १६ ॥ स्नेहं बहुविधं स्वप्ने चण्डालैः सह यः पिवेत् । बध्यते स प्रमेहेण स्पृश्यतेऽन्ताय मानवः ॥ १७ ॥ (१०) जिस मनुष्य के स्नान करने और चन्दन का लेप करने पर भी मक्खिया शरीर पर से नहीं उड़तीं वह प्रमेह का रोगी होकर उसी से मृत्यु को प्राप्त होता है । (११) जो मनुष्य स्वप्न में नाना प्रकार के स्नेहों का चाण्डालों के साथ पान करता है, वह प्रमेह के रोग से आक्रान्त होकर प्रमेह से मरता है ॥१६-१७॥ ध्यानायासौ तथोद्वेगो मोहश्चास्थानसंभवः । अरतिर्बलहानिश्च मृत्युरुन्मादपूर्वकः ॥ १८ ॥ आहारद्वेषिण पश्येल्लुप्तचित्तमुददितम् । विद्याद्धीरो मुमूर्षु तमुन्मादेनातिपातिना ॥ १९ ॥ क्रोधन त्रासबहुल सकृत्प्रहसिताननम् । मूर्च्छापिपासाबहुल हन्त्युन्मादः शरीरिणम् ॥ २० ॥ नृत्यन् रक्षोगणैः साध य. स्वप्नेऽम्भसि सीदति । स प्राप्य भृशमुन्माद याति लोकमितः परम् ॥ २१ ॥ (१२) जिसको ध्यान और श्रम, उद्वेग और मोह आदि बिना अवसर के (समय के बिना जहा नहीं करने चाहिये वहा) हों, उदासीनता और बलहानि हो जाये, उसकी मृत्यु उन्माद रोग से होती है । (१३) भोजन से द्वेष करनेवाला, जिसका चित्त नष्ट हो गया हो, (अस्थिर चित्त), तथा ऊर्ध्व वात से पीडित हो, ऐसा रोगी उन्माद रोग से मरता है । (१४) अत्यन्त क्रोधी, बहुत डरने वाला, एकदम सहसा हसने लगे, अतिशय मूर्छा प्यासवाला रोगी उन्माद से मरता है । (१५) जो मनुष्य स्वप्न में राक्षसों के साथ नृत्य करता हुआ पानी में डूब जाता है, वह तीव्र उन्माद रोग से मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ १८-२१ ॥ असत्तत्त्वः पश्यति यो यः शृणोत्यसत. स्वरान् । बहून् बहुविधाञ्जाग्रत्सोऽपस्मारेण बध्यते ॥ २२ ॥ मत्तं नृत्यन्तमाविष्य प्रेतो हरति यं नरम् । स्वप्ने हरति तं मृत्युरपस्मारपुरःसरः ॥ २३ ॥