भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

१७२ चरकसंहिता [ अ० ६ हुआ भोजन भी नीचे नहीं उतरता, और जीभ कण्ठभाग में आ लगती है तथा बल नष्ट हो जाता है ॥ २५ ॥ शिरो विक्षिप्तते कृच्छ्रान्मुञ्चयित्वा प्रपाणिकौ । ललाटप्रस्रुतस्वेदो मुमूर्षुश्च्युतबन्धनः ॥ २६ ॥ ( २४ ) जो रोगी बड़े कष्ट से पीड़ित होकर अपने दोनों कलाईयों या कोह- नियों को छोड़कर शिर को इतना धुनता-पटकता है कि माथे से पसीना टपकने लगे और सन्धिबन्ध ढील पड़ जायें वह रोगी मरने वाला होता है ॥ २६ ॥ तत्र श्लोकः । इमानि लिङ्गानि नरेषु बुद्धिमान्विभावयेतावहितो मुहुर्मुहुः । क्षणेन भूत्वा ह्युपयान्ति कानिचिन्न चाफल लिङ्गमहास्ति किंचन ॥२७॥ बुद्धिमान् मनुष्य को मरणोन्मुख रोगियों में होने वाले लक्षण खूब ध्यान से देखने चाहियें । क्योंकि कितने लक्षण क्षणभर मे उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकरण में कहा एक भी लक्षण निष्फल नहीं ॥ २७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने अवाक्शिरसीय- मिन्द्रिय नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ नवमोऽध्यायः अथातो यस्य श्यावानिमित्तीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'श्याव-निमित्तीय' नामक इन्द्रिय-अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ यस्य श्यावे परिध्वस्ते हर्रिते चापि दर्शने । आपन्नो व्याधिरन्ताय ज्ञेयस्तस्य विजानता ॥ ३ ॥ ( १ ) जिस रोगी की दोनों आखें काली, लाल रग की, नष्टप्राय, हरे रग की हो जाये विद्वान् वैद्य उस रोगी की व्याधि प्राण नाश के लिये जाने ॥ ३ ॥ निःसंज्ञः परिशुष्कास्यः संविद्धो व्याधिभिश्च यः । उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ ४ ॥ हरिताश्च सिरा यस्य लोमकूपाश्च संवृताः । सोऽम्लाभिलाषी पुरुषः पित्तान्मरणमश्नुते ॥ ५ ॥