चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 21, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें६ चरकसंहिता [अ० १ वाला (आकाश, वायु, अग्नि, जल) और पृथिवी पाच गुणों वाली है। इस प्रकार अगले भूत का गुण क्रम से दूसरे २ भूत में आता जाता है १ ॥२८॥ खरद्रवचलोष्णत्वं भूजलानिलतेजसाम् । आकाशस्याप्रतीघातो दृष्टं लिङ्गं यथाक्रमम् ॥ २६ ॥ लक्षणं सर्वमेवैतत्स्पर्शनेन्द्रियगोचरम् । स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयः स्पर्शो हि सविपर्ययः ॥ ३० ॥ पञ्च महाभूतों के लक्षण - खरत्व, द्रवत्व, चलत्व, उष्णत्व और अप्रतिहनन ये पृथिवी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के क्रमशः लक्षण समझने चाहिये । ये सब लक्षण स्पर्शनेन्द्रिय (त्वचा) से ग्रहण करने योग्य है । इनमें आकाश का अप्रतिहनन (रोक न करना) भी स्पर्श के विपरीत अस्पर्श होने से ही त्वचा से ग्रहण करने योग्य है। [क्योंकि जो द्रव्य जिस इन्द्रिय से ग्रहण किया जाता है, उस द्रव्य के अभाव का भी उसी इन्द्रिय से ग्रहण होता है । इसलिये आकाश का अप्रतिघात गुण भी स्पर्शनेन्द्रिय से ही ग्रहण करने योग्य है ] ॥ २९-३० ॥ गुणाः शरीरे गुणिनां निर्दिष्टाश्चिह्नमेव च । अर्थाः शब्दादयो ज्ञेया गोचरा विषया गुणाः ॥ ३१ ॥ ग्राह्य-विषय- शरीर में गुणियों के गुण चिह्न रूप ही कहे हैं। इसलिये खरत्व आदि गुणों का लक्षण शब्द से ही कह दिया है। शब्द आदि पाच भूतों के गुण हैं, वे ही अर्थ हैं। इनको इन्द्रियगोचर या विषय अथवा गुण करके जानना चाहिये ॥ ३१ ॥ या यदिन्द्रियमाश्रित्य जन्तोर्बुद्धिः प्रवर्तते । याति सा तेन निर्देशं मनसा च मनोभवा ॥ ३२ ॥ प्राणी की जो बुद्धि (ज्ञान) जिस इन्द्रिय की सहायता से उत्पन्न होती है, वह बुद्धि उसी इन्द्रिय से कही जाती है। जैसे आख से प्रवृत्त होने वाली बुद्धि चक्षुर्बुद्धि कही जाती है। इसी प्रकार मन से उत्पन्न होने वाली बुद्धि मनोभवा बुद्धि कहाती है ॥ ३२ ॥ भेदात्कार्येन्द्रियार्थानां बह्व्यो वै बुद्धयः स्मृताः । आत्मेन्द्रियमनोर्थानामेकैकसंनिकर्षजा ॥ ३३ ॥ १ आकाशपवनदहनतोयभूमिषु यथासङ्ख्यमेकोत्तरपरिवृद्धा शब्दस्पर्शरूप- रसगन्धाः । (सुश्रुतसूत्र ४२ अ०)