भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 210

१६६ चरकसंहिता [ अ० १ अथवा भिलावे का लेप)। और सानुबाधन औषध-दीर्घकाल तक रहनेवाले कुष्ठ आदि विकारों को उत्पन्न करता है (जैसे-मत्स्य को दूध के साथ खाना) ॥ ४॥ स्वस्थस्यौजस्करं यत्तु तद् वृष्यं तद् रसायनम् ॥ ५ ॥ प्रायः, प्रायेण रोगाणां द्वितीयं प्रशमे मतम् । प्रायःशब्दो विशेषार्थो ह्युभयं ह्युभयार्थकृत् ॥ ६ ॥ रसायन—जो औषध स्वस्थ पुरुष के बल वीर्य को बढ़ाता है वह औषध प्राय. वृष्य और रसायन होता है। दूसरी प्रकार का औषध प्रायः रोगों का शमन करता है । यहाँ पर प्रयुक्त हुआ 'प्रायः' शब्द विशेषार्थवाची है । साधा- रणतः दोनों प्रकार के कार्य करते हैं । [जैसे-क्षतक्षीण अध्याय में कहा सर्पि- र्गुड़ रसायन और वृष्य दोनों हैं । ] ॥ ५-६ ॥ दीर्घमायुः स्मृतिं मेधामारोग्यं तरुणं वयः । प्रभावर्णस्वरौदार्यं देहेन्द्रियबलं परम् ॥ ७ ॥ वाक्सिद्धि प्रणतिं कान्तिं लभते ना रसायनात् । लाभोपाया हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ॥ ८ ॥ रसायन के कार्य—रसायन के सेवन से पुरुष दीर्घ आयु, स्मृति (पूर्व अनुभूत का स्मरण करने का सामर्थ्य ), मेधा ( धारणात्मिका बुद्धि ), आरोग्य, तरुण वय (जवानी), प्रभा, वर्ण, स्वर की उदारता (प्रशस्तता), उत्कृष्ट देह-बल, इन्द्रिय-बल, वाक्-सिद्धि (जो कहा जाय वह अवश्य होकर रहे), प्रणति (लोकों की पूजनीयता) और कान्ति प्राप्त करता है । इन गुणों की प्राप्ति में कारण—प्रशस्त रस (आहार, वार्य, विपाक) आदि के लाभ के उपाय ही रसायन हैं। (उत्तम रस से धातु भी उत्तम होते हैं) ॥७-८॥ अपत्यसन्तानकरं यत्सद्यः संप्रहर्षणम् । वाजीवातिबलो येन यात्यप्रतिहतः स्त्रियः ॥ ६ ॥ भवत्यतिप्रियः स्त्रीणां येन येनोपचीयते । जीर्यतोऽप्यक्षयं शुक्रं फलवद्येन दृश्यते ॥ १० ॥ प्रभूतशाखः शाखीव येन चैत्यो यथा महान् । भवत्यर्च्यो बहुमतः प्रजानां सुबहुप्रजः ॥ ११ ॥ सन्तानमूलं येनेह प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते । यशः श्रियं बलं पुष्टिं वाजीकरणमेव तत् ॥ १२ ॥ वाजीकरण औषध—जो औषध सन्तान-परम्परा (सन्तान-तन्तु) पुत्र पौत्रादि की शृङ्खला को बनाती है, जिसके सेवन से प्रहर्ष (लिंग में कामोत्ते- जना, हर्ष) होता है, जिसके सेवन से पुरुष घोड़े के समान अति बलशाली