चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०८ चरकसंहिता [ अ० १
अनुलोमता प्राप्त होती है । कुटी-प्रावेशिक विधि से इस रसायन का प्रयोग करने वाला वृद्ध पुरुष भी वार्द्धक्य के चिह्नों से रहित होकर नई जवानी के रूप को धारण करता है, (मात्रा १ से २ तोला तक) ॥ ६१-७३ ॥ अथाऽऽमलक-हरीतकीनामामलक-बिभीतकानां हरीतकी-बिभीत- कानामामलक-हरीतकी-बिभीतकानां वा पलाशत्वगवनद्धानां मृदावलि- प्तानां कुकूलैके स्विन्नानाममुलकानां पल-सहस्रमुलूखले सगोथ्य दधि- घृत-मधु-पलल तैल-शर्करा संप्रयुक्तं भक्षयेदनन्नभुग्यथोक्तेन विधिना, तस्यान्ते यवाग्वादिभिः प्रकृत्यवस्थापनमभ्यङ्गोत्सादन सर्पिषा यवचू- र्णैश्च, अयं च रसायन-प्रयोग-प्रकर्षो द्विस्तावदग्नि-बलमभिसमीक्ष्य प्रति- भोजनं यूषेण पयसा वा षाष्टिकः ससर्पिष्कोऽतः परं यथासुखविहारः कामभक्ष्यः स्यात् । अनेन प्रयोगेणर्षयः पुनर्युवत्वमवापु, बभूवुश्चानेक- वर्षशतजीविनो निर्विकाराः पर शरीर-बुद्धीन्द्रिय-बल-समुदिताः, चेरु- श्चात्यन्तनिष्ठया तप इति ॥ ७४ ॥ इति चतुर्थामलकरसायनम् । आमलक रसायन (४)-आवले और हरड, (२) आवले ओर बहेड़ा (३) हरड और बहेड़ा, (४) वा आवला हरड और बहेड़ा इन चारों मे से किसी एक योग का लेकर, ढाक का गोली छाल से लपेट कर, ऊपर से मिट्टी का लेप चढ़ा कर गोहों की आग में स्विन्न करना चाहिये । स्विन्न होने पर इनकी गुठलिया निकाल कर एक हजार पल परिमित मात्रा में ऊखल से कूट ले । इनमें दही, घी, शहद, पलल (तिल कल्क), तैल, शर्करा मिला कर कुटीप्रावे- शिक विधि से सेवन करे । इस के सेवन के समय दूसरा किसी प्रकार का कोई अन्न आहार नहीं खाना चाहिये । पश्चात् यवागू आदि पेया द्वारा प्रकृति मे अर्थात् पूर्व भोजन पर लाना चाहिये । प्रति दिन घी का मालिश और जौ के चूर्ण से उबटन करे* । अग्नि बल को देखते हुए इस रसायन को दो ही बार सेवन करे । भोजन में घी युक्त साठी का यूष या दूध के साथ खाना चाहिये । इसके पश्चात् यथेच्छ आहार-विहार का उपभोग करना चाहिये । इस प्रयोग से ऋषियों ने पुनः युवावस्था को प्राप्त किया था, अनेक वर्षों की आयु भोगी थी, वे देर तक नीरोग और शरीर बुद्धि, इन्द्रिय बल से युक्त रहे, उन्होंने अत्यन्त निष्ठा से तप किया ॥ ७४ ॥ हरीतक्यामलक-बिभीतक-पञ्च पञ्चमूल-निर्यूहेण पिप्पली-मधु-मधू- क-काकोली-क्षीरकाकोल्यात्मगुप्ता-जीवकर्षभक-क्षीर-शुक्ला-कल्क-संप्र-
- अष्टाङ्गसंग्रह के अनुसार रसायनावधि प्रयोग के दुगन दिन घी की मालिश और जौ का उबटन करना चाहिये ।