चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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२१० चरकसंहिता [ अ० १
हरितक्यादि योग (२)—हरड़, आवला, बहेड़ा पृश्निपर्णी, हल्दी, खरैंटी,
बायविडंग, गिलोय, सोंठ, मुलहठी, पिप्पली, सोमवल्क (खदिर श्वेत) इनके क्वाथ
से सिद्ध दूध में से बनाये घी के साथ मधु और शर्करा मिलाकर तथा एक सौ
आंवलों के चूर्ण को आंवलों का स्वरस मिलाकर इस चूर्ण से चतुर्थांश लौह भस्म
मिलाकर दोनों को सम्मिलित करके प्रति दिन प्रातः कुटि प्रावेशिक विधि से एक
कर्ष मात्रा मे सेवन करे। सायंकाल घी मिश्रित शालि या साठी के भात को दूध
या मूग के यूष के साथ खाना चाहिये। इस प्रकार से तीन साल तक इस प्रयोग
को करने पर एक सौ वर्ष तक बिना बुढ़ापे के आयु रहती है, पढ़ा, सुना सब
याद रहता है सब रोग नष्ट हो जाते हैं, शरीर में विष निर्विष हो जाता है, शरीर
पत्थर के समान दृढ हो जाता है, प्राणियों से तिरस्कृत नहीं होता । ['अदृश्यों
भूताना भवति' के स्थान पर 'अधृष्यो भूताना भवति' पाठ ठीक है। यही अर्थ
किया है। वला के स्थान पर वचा भी पाठ है। कविराज गंगाधर सेन ने हरितकी
आदि द्रव्यों के क्वाथ और कल्क दोनों में घृतपाक का विधान किया है] ॥७६॥
भवन्ति चात्र-यथाऽमराणाममृतं यथा भोगवता सुधा।
तथाऽभवन्महर्षीणां रसायनविधिः पुरा ॥ ७७ ॥
न जरा न च दौर्बल्यं नातुर्यं निधनं न च।
जग्मुर्वर्षसहस्राणि रसायनपराः पुरा ॥ ७८ ॥
न केवलं दीर्घमिहाऽऽयुरश्नुते रसायनं यो विधिवन्निषेवते।
गति स देवर्षिनिषेवितां शुभा प्रपद्यते ब्रह्म तथेति चाक्षर (य) म् ॥७९॥
जिस प्रकार देवताओ के लिये अमृत, नागों के लिये सुधा थी, उसी प्रकार
पूर्व काल में महर्षियों के लिये रसायन विधि थी। उस समय में रसायन को
सेवन करने वाले महर्षि न वृद्धावस्था, न दुर्बलता, न रोग और न मृत्यु को ही
(काल से पूर्व) प्राप्त हुए। उन्होंने हजारो वर्षों की आयु भोगी थी। जो पुरुष
विधिपूर्वक रसायन का सेवन करता है उसे केवल दीर्घायु ही नही मिलती अपि तु
वह देवर्षियो से प्राप्त शुभ गति को प्राप्त करता है, ब्रह्म (परमात्मा) का साक्षात्कार
करता है, उस अक्षय ब्रह्म के प्राप्त होने से मुक्ति मिल जाती है ॥ ७७-७९ ॥
तत्र श्लोकः-अभयामलकीयेऽस्मिन् षड्योगाः परिकीर्तिताः।
रसायनाना सिद्धानामायुर्येरनुवर्तते ॥ ८० ॥
इस अभयामलकीय रसायन पाद में सिद्ध रसायनों के छः प्रयोग कहे हैं,
जिनके सेवन से दीर्घायु मिलता है ॥ ८० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थानेप्रथमेऽध्यायेऽ-
भयामलकीयो नाम रसायनपादः प्रथमः ।