भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

२१२ चरकसंहिता [ अ० १

सौवर्णे राजते मार्त्तिके वा शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे स्थापयेत् ।
तद्यथोक्तेन विधिना यथाग्नि प्रातः प्रातः प्रयोजयेत्, जीर्णे च क्षीर-
सर्पिभ्यां शालिषष्टिकमश्नीयात् । अस्य त्रिवर्षप्रयोगाद्वर्षशतं वयोऽ-
जरं तिष्ठति, श्रुतमवतिष्ठते, सर्वामयाः प्रशाम्यन्ति, अप्रतिहतगतिः
स्त्रीष्वपत्यवान् भवति ॥ ४ ॥
हे प्राण (दीर्घ आयु और स्वस्थता) की कामना रखनेवालों ! सुनो जो
हम कहते हैं, अमृत जिस प्रकार मे देवताओं के लिये हितकारी है, उसी
प्रकार से यह रसायन विधि तुम्हारे लिये दूसरे अमृत के समान हितकारी और
उपयोगी है, यह रसायन विधि अचिन्त्य प्रभाव होने से अद्भुत शक्तिवाली,
आयुवर्द्धक, आरोग्यदायक, आयुस्थापक, निद्रा (वैकारिक), तन्द्रा, श्रम
(थकान), क्लम (पीड़ा), आलस्य और निर्बलता को दूर करनेवाली, वात,
कफ और पित्त को शान्त करती है, स्थिरता (दृढता) को उत्पन्न करती है,
अबद्ध (शिथिल) मांस को सुगठित बनाती है, कायाग्नि को प्रदीप्त करती है,
प्रभा (कान्ति), स्वर और वर्ण को श्रेष्ठ बनाती है। इस रसायन विधि से
च्यवन आदि महर्षियों ने फिर से जवानी प्राप्त की थी। इसीसे वे स्त्रियों के अति-
प्रिय बने, उनके शरीर की मांसपेशियां दृढ़, समानरूप, सुगठित हो गई थी,
उनके शरीर मजबूत तथा स्थिर हो गये थे, उनके बल, वर्ण और इन्द्रियां
श्रेष्ठ कोटि की हो गई थीं। उनका पराक्रम अप्रतिहत (बेरोक-टोक) था और वे
सब प्रकार के क्लेश उठा सकते थे।
जो व्यक्ति खट्टा, लवण, कटु, क्षार, शुष्क, शाक, माष (वा मास), तिल
कल्क, पिष्टान्न (पिठ्ठी के बने पदार्थ) का सेवन करते हैं, अङ्कुरित (जड़ाया
हुआ), या नये (उसी साल के) शूक या शमीधान्य का उपयोग करते हैं,
परस्पर विरुद्ध, असात्म्य, रूक्ष, क्षार, अभिष्यन्दी द्रव्य का सेवन करते हैं, जो
क्लिन्न (गीला), गुरु, सड़ा, बासी भोजन करते हैं, विषम भोजन या अध्यशन
(भोजन पर और अधिक भोजन) करते हैं, जो दिन में सोते, स्त्री-संग या
मद्य का सेवन करते, विषम या अधिक व्यायाम के कारण शरीर को चलाते
डुलाते हैं, जो भय, क्रोध, शोक, लोभ और आयास से पीड़ित होते हैं, उन
व्यक्तियों में ग्राम्य आहार के कारण सब दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसी कारण
से उनकी मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं। सन्धियां अलग होने लगती हैं, रक्त
विदग्ध (जलफुक) जाता है, मेद अधिक मात्रा मे बाहर आता है, मज्जा
अस्थियों को छोड़ देती है, शुक्र उत्पन्न नहीं होता, ओज क्षीण हो जाता है।
इस प्रकार की अवस्था में मनुष्य ग्लानियुक्त (ढीला, हर्षरहित) रहता है,