भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 25

२० चरकसंहिता [ अ० १ निमेषकालाद्भावानां कालः शीघ्रतरोऽत्यये । भग्नानां न १पुनर्भावः कृत नान्यमुपैति च ॥ ५० ॥ मतं तत्त्वविदामेतद्यस्मात्तस्मात् स कारणम् । क्रियोपभोगे भूतानां नित्यः पुरुषसंज्ञकः ॥ ५१ ॥ जितने समय में आंख की पलक झपकती है यह 'निमेष काल' कहाता है । इस निमेष काल से भी अधिक शीघ्रता से भाव बदल रहे हैं, नाश हो रहे हैं । नाश हुए पदार्थों का पुनः सद्भाव नहीं होता और एक के किये कर्म का फल दूसरा नहीं भोगता, अपितु जिसने किया होता है वही भोगता है । यही सब तत्त्वज्ञानियों का सिद्धान्त है । इसलिये प्राणियों के किये हुए कर्म का फल भोगने वाला देह से अतिरिक्त नित्य 'पुरुष' नामक चेतन आत्मा है ॥५०-५१॥ अहङ्कारः फलं कर्म देहान्तरगतिः स्मृतिः । विद्यते सति भूतानां कारणे देहमन्तरा ॥ ५२ ॥ आत्मा के देह से पृथक् होने पर ही अहंकार-भाव ( मैंने यह किया, मैं यह जानता हूँ), फल को उद्देश्य रख कर काम करना, किये कर्म का फल भोगना, एक शरीर से दूसरे शरीर में जाना, स्मृति अर्थात् स्मरण (बाल्या- वस्था का यौवनावस्था में स्मरण), ये सब बातें होती हैं ॥ ५२ ॥ प्रभवो न ह्यनादित्वाद्भिद्यते परमात्मनः । पुरुषो राशिसंज्ञस्तु मोहेच्छाद्वेषकर्मजः ॥ ५३ ॥ परमात्मा का कोई उत्पत्ति कारण नहीं है, क्योंकि वह अनादि है । परन्तु राशि-संज्ञक पुरुष को भोगों के आयतन (आश्रय) रूप शरीर का मोह, इच्छा, राग और द्वेष ये तीन२ उत्पन्न करते हैं ॥ ५३ ॥ आत्मा ज्ञः, करणैर्योगज्ज्ञानं त्वस्य प्रवर्तते । करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न वर्तते ॥ ५४ ॥ १ 'भग्नानां च पुनर्भाव' इति पाठान्तरम् । अर्थात् टूटे हाथ पांव आदि भी पुन बन जाते हैं, यह भी आत्मा की सत्ता का प्रमाण है । २ तीनों दोषों के तीन पक्ष हैं । यथा—(१) रागपक्ष—काम, मत्सर, स्पृहा तृष्णा और लोभ । (२) द्वेषपक्ष—क्रोध, ईर्ष्या, असूया, द्रोह, अमर्ष । (३) मोहपक्ष—मिथ्याज्ञान, विचिकित्सा, मान और प्रमाद । वात्स्यायन (न्या० ४ । १ ३) पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः। न्याय । दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानाना- मुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः ॥