चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें२४२ चरकसंहिता [ अ० १ जो पुरुष समर्थ ( शक्तिशाली, ऐश्वर्यवान् ) हों, नीरोगी हों, बुद्धिमान हों और जितेन्द्रिय हों, तथा अपने कार्य धंधे में स्वतंत्र हों, क्षमाशील हों और साधनों से सम्पन्न हों उनके लिये कुटी-प्रावेशिकविधि हितकारी है। इन उप- रोक्त गुणों से जो रहित हों उनके लिये सूर्य मारुतिक (वातातपिक) विधि हितकारी है। इन दोनों विधियों में कुटीप्रावेशिक-विधि अधिक श्रेष्ठ और करने में अति दुष्कर है रसायन विधि के मिथ्या आचरण से यदि कोई रोग उत्पन्न हो जाय, तो तुरन्त रसायन का प्रयोग छोड़कर रोगानुसार औषध करनी चाहिये ॥ २७-२६ ॥ सत्यवादिनमक्रोधं निवृत्तं मद्यमैथुनात् । अहिंसकमनायास प्रशान्तं प्रियवादिनम् ॥ ३० ॥ जप शौचपरं १ धीरं दाननित्यं तपस्विनम् । देवगोब्राह्मणाचार्यगुरुवृद्धार्चने रतम् ॥ ३१ ॥ आनृशंस्यपरं नित्यं नित्यं करुणवेदिनम् । समजागरणस्वप्नं नित्यं क्षीरघृताशिनम् ॥ ३२ ॥ देशकालप्रमाणज्ञं युक्तिज्ञमनहंकृतम् । शस्ताचारमसंकीर्णमध्यात्मप्रवणेन्द्रियम् ॥ ३३ ॥ उपासितारं वृद्धानामास्तिकानां जितात्मनाम् । धर्मशास्त्रपरं विद्यान्नरं नित्यरसायनम् ॥ ३४ ॥ गुणैरेतैः समुदितै प्रयुङ्क्ते यो रसायनम् । रसायनगुणान् सर्वान् यथोक्तान् स समश्नुते । इत्याचाररसायनम् । आचार-रसायन—सत्यवादी, क्रोध न करनेवाले मद्य मैथुन से पृथक् , अहिंसक ( मन, वचन, कर्म से ), अनायास [ श्रम न करनेवाले ], शान्त, प्रियवादी, यज्ञ-पवित्रता के पालक, धीर, दानी, तपस्वी, द्वन्द्व को सहनेवाले, देवता, गौ, ब्राह्मण, आचार्य, गुरु, इनकी पूजा में सदा तत्पर, नित्य क्रूरता से परे, सदा प्राणियों पर करुणा भाव रखनेवाले, युक्त मात्रा में सोने और जागने वाले, नित्य दूध और घी को खानेवाले, देश, काल मात्रा को जाननेवाले, युक्ति को समझनेवाले, अहंकार से शून्य, सदाचार युक्त, असंकीर्ण (उदारचेता) आत्मज्ञान की ओर झुके, वृद्ध पुरुषों आस्तिकों तथा जितात्मा पुरुषों के पास बैठने वाले, उनकी सेवा में तत्पर, नित्य धर्मशास्त्र का पाठ करनेवाले तथा १. 'याज्यशौच' इति च पाठः ।