भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

२७२ चरकसंहिता [ अ० २ शुक्र नहीं है। परन्तु जब इनकी वृद्धि और ह्रास होता है तो शुक्र का होना भी निश्चित है। शरीर का कोई भी अङ्ग ऐसा नहीं जहा वीर्य न हो ] । यह शुक्र स्त्री और पुरुष के सयोग होने पर, चेष्टा, सकल्प तथा परस्पर पीड़न ( सम्मूर्छन, दबाने ) के कारण अपने वास्तविक स्थान से पृथक् होकर झरने लगता है, जिस प्रकार कि गीले कपड़े से पानी टपकने लगता है ॥४४-४७॥ हर्षात्तर्षात्सरत्वाच्च पैच्छिल्याद् गौरवादपि । अणुप्रवणभावाच्च द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ ४८ ॥ अष्टाभ्य एभ्यो हेतुभ्यः शुक्रं देहात्प्रसिच्यते । निम्न आठ कारणों से शुक्र सम्पूर्ण शरीर से मथा जाकर प्रवृत्त होता है । हर्ष से, तर्ष ( उपभोग की इच्छा ) से, सर गुण होने से ( बहने का स्वभाव होने से ), पिच्छिल ( चिकना ) होने से, गौरव ( गुरु ) होने से, अणु (सूक्ष्म) होने से, प्रवण ( बाहर निकलने का स्वभाव होने से ),१ वायु के शीघ्रगामी होने से वीर्य बाहर आता है२ ॥ ४८- ॥ १. कावराज गगाधर सन ने 'हृषात्सरत्वासोक्ष्म्याच्च' यह पाठ दिया है। इसी प्रकार 'अणु-प्रवण-भावाच्च' के स्थान पर 'अनुप्लवनभावाच्च' यह पाठ पढ़ा है। 'अनुप्लवन' का अर्थ शिश्न को मास पेशियों का रह रह कर संकोच होना बताया है। इन सकोचों के कारण वीर्य झटकों के साथ बाहर आता है। वीर्य का क्षरण वात पर निर्भर है। यह केन्द्र मस्तिष्क और मेरुदण्ड में है। “सुप्रसन्न मनस्तत्र हर्षणे हेतुरुच्यते ।” सुश्रुत २. साधारणत. जब कामेच्छा उत्पन्न होती है उस समय शरीर के अवयवों में परिवर्त्तन आरम्भ हो जाता है। यह परिवर्त्तन मुख्य रूप से श्वास का तेज होना, गालों में लालिमा का दौड़ना, किसी काम में दिल न लगना, शिश्न में हर्ष, छाती में कम्पन होता है। इस अवस्था में रक्तसचार में भी अन्तर आ जाता है। रक्तसचार की गति बढ जाती है। इतना ही नही, रक्त के अन्दर स्वय परिवर्त्तन आ जाता है। इसका प्रभाव माता के दूध पर भी पड़ जाता है। कामेच्छा के समय पिलाया दूध शिशु को हानि करता है। इन परिवर्त्तनों के कारण पुरुष के अण्ड अपना अन्तः स्राव को उत्पन्न करने का कार्य बन्द करके, बहिःस्राव पैदा करने लगते हैं। इस वीर्य के गाढ़ा होने के कारण यह शिश्न तक पहुँच जाये इसलिये इसमें पौरुष ग्रन्थि तथा शिश्न में मूत्र मार्ग की दिवारों मे रहने वाली ग्रन्थिया अपना अपना रस मिला देती हैं। यदि यह रस बहुत मिल जाये तो वीर्य पतला हो जाता है।