चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें२८० चरकसंहिता [ अ० ३ अद्भिदोषधिभिश्चैव मधुराभिञ्चितः कफः । हेमन्ते सूर्यसन्तप्तः स वसन्ते प्रकुप्यति ॥ ४६ ॥ वसन्ते श्लेष्मणा तस्माज्ज्वरः समुपजायते । आदानमध्ये तस्यापि वातपित्तं भवेदनु ॥ ४७ ॥ आदावन्ते च मध्ये च बुद्ध्वा दोषबलाबलम् । शरदूसन्तयोर्विद्वाञ्ज्वरस्य प्रतिकारयेत् ॥ ४८ ॥ कालप्रकृतिमुद्दिश्य निर्दिष्टः प्राकृतो ज्वरः । मधुर रस, जल और ओषधियों द्वारा हेमन्त ऋतु में संचित कफ, वसन्त- ऋतु में सूर्य की गरमी द्वारा कुपित होता है । इसलिये वसन्तऋतु में कफजन्य ज्वर उत्पन्न होता है । जिससे यह आदान काल का मध्यवर्ती समय होता है, इसलिये वायु और पित्त भी इस कफ के अनुबन्ध बन जाते हैं। इससे इस समय भी थोड़ा लंघन करने से कोई भय नहीं रहता । कफ और पित्त दोनों द्रव धातु हैं, अतः ये लंघन को सहन कर सकते हैं। इसलिये वैद्य को चाहिये कि शरद् तथा वसन्त ऋतु में उत्पन्न प्राकृत ज्वर की चिकित्सा काल के आदि, अन्त और मध्य में दोष के बलाबल को देखकर करे । वसन्त के प्रारम्भ में कफ प्रबल, मध्य में मध्यबल, और अन्त में निर्बल, शरद् के प्रारम्भ में पित्त प्रबल, मध्य में मध्यबल और अन्त में निर्बल होता है । इस प्रकार काल की प्रकृति के उद्देश्य से प्राकृत ज्वर को कह दिया है ॥ ४६-४८ ॥ प्रायेणानिलजो दुःखः कालेष्वन्येषु वैकृतः ॥ ४६ ॥ वर्षाऋतु में होनेवाला वातजन्य ज्वर प्राकृत होते हुए भी प्रायः कष्टसाध्य होता है । इसी प्रकार अन्य कालों मे ( शरद् ऋतु में कफजन्य या वसन्त में पित्तजन्य ) उत्पन्न वैकृत ज्वर विरुद्ध चिकित्सा होने से कष्टसाध्य है ॥ ४६ ॥ हेतवो विविधास्तस्य निदाने संप्रदर्शिताः । बलवत्स्वल्पदोषेषु ज्वर. साध्योऽनुपद्रवः ॥ ५० ॥ इस वैकृत ज्वर के निदान कारणों को निदानस्थान में कह दिया है । बलवान् तथा अल्प दोषवाले पुरुषों मे उपद्रवों से रहित ज्वर साध्य है ॥ ५०॥ हेतुभिर्बहुभिर्जातो बलिभिर्बहुलक्षणः । ज्वरः प्राणान्तकृद्धश्च शीघ्रमिन्द्रियनाशनः ॥ ५१ ॥ जो ज्वर बहुत प्रबल कारणों को लेकर उत्पन्न होता है, बहुत से लक्षणों से युक्त हो शीघ्र इन्द्रिय-शक्तियों को नष्ट कर देता है, वह ज्वर प्राणनाशक होता है ॥ ५१ ॥