चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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२६८ चरकसंहिता [ अ० ३
तर्पण करना चाहिये । तर्पण के जीर्ण होने पर सात्म्य और बल की अपेक्षा से
मृग के यूष या जंगल के पशु पक्षियों के मांस रस के साथ चावल
देना चाहिये ॥ १५५-१५७ ॥
अन्नकालेषु चाप्यस्य विधेयं दन्तधावनम् ।
योऽस्य वक्त्ररसस्तस्माद्विपरीत प्रियं च यत् ॥ १५८ ॥
तदस्य मुखवैशद्यं प्रकाङ्क्षां चान्नपानयोः ।
धत्ते रसविशेषाणामभिज्ञत्वं करोति यत् ॥ १५९ ॥
विशोध्य द्रुमशाखाग्रैरास्यं प्रक्षाल्य चासकृत् ।
मस्त्विक्षुरसमद्याद्यैर्यथाहारमवाप्नुयात् ॥ १६० ॥
पाचनं शमनीयं वा कषायं पाययेत्तु तम् ।
अन्न काल में रोगी को दातुन करानी चाहिये । दातुन ऐसी होनी चाहिये
जिसका रस रोगी के मुख के रस से विपरीत हो, और रोगी को प्रिय लगे ।
दातुन करने से मुख स्वच्छ होता है, खान-पान में रुचि होती है, भिन्न भिन्न
रसों का परिज्ञान होता है । दातुन से मुख को साफ करके गरम पानी से मुख
को स्वच्छ करके, मस्तु (दही का पानी), गन्ने का रस, मद्य आदि (मूग के
यूष) के साथ भोजन करना चाहिये । [कुछ विद्वानों की सम्मति में इनका
केवल मुख में धारण करना चाहिये] । छठे दिन के बीत जाने पर लघु अन्न
का भोजन कराके अगले दिन पाचनीय या शमनीय कषाय देना चाहिये ।
[लङ्घन की मर्यादा—दोष के अनुसार ही ज्वर के निमित्त ३, २, या छः रात
लङ्घन करे ।] अपक्व आहार अपक्व दोषों को तथा अपक्व रस को पकाने वाले
कषाय को 'पाचक' कहते हैं । जो दुष्ट दोषों को बाहर नहीं निकालता, प्रकुपित
दोषों को शमन करता है, प्रकृतिस्थ दोषों, धातुओं में परिवर्त्तन नहीं लाता
उसको 'शमनीय' कहते हैं । [प्रथम लङ्घन से दोषों को शान्त करना (पचाना)
चाहिये । छः दिन तक लङ्घन कराने पर भी यदि दोष न पके तो पाचनीय
कषाय देना चाहिये । और जब दोषों का परिपाक हो जाये तो शमनीय कषाय
देना चाहिये] ॥ १५८-१६० ॥
ज्वरितं षडहेऽतीते लघ्वन्नप्रतिभोजितम् ॥ १६१ ॥
स्तभ्यन्ते न विपच्यन्ते कुर्वन्ति विषमज्वरम् ।
दोषा बद्धाः कषायेण स्तम्भित्वात्तरुणे ज्वरे ॥ १६२ ॥
न तु कल्पनमुद्दिश्य कषायः प्रतिषिध्यते ।
यः कषायः कषायः स्यात्स वर्ज्यस्तरुणज्वरे ॥ १६३ ॥