भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०१ शिरोविरेचन—जीर्णज्वर मे देह के गुरु हाने पर, शिरोवेदना मे, इन्द्रिना के अपने विषय मे प्रवृत्त न होने पर शिरोविरेचन देना चाहिये। यह विरेचन रुचि ( विपयो मे प्रीति ) करता है । [ यहा पर वैरेचनिक नस्य से अभिप्राय है। परन्तु यदि शिर मे शून्यता अनुभव हो तो स्नैहिक धूम नस्य, यदि दाह हो तो पित्तनाशक शमनीय धूम का प्रयोग करना चाहिये । ] वैद्य का चाहिये कि जीर्णज्वर मे शीतकारण से उत्पन्न तथा उष्ण कारण से उत्पन्न ज्वर की विवेचना करके अभ्यग, प्रदेह, स्नेहयुक्त अवगाहन देवे । यदि शोत कारण से ज्वर उत्पन्न हो तो उष्ण अभ्यग आदि देने चाहिये । उष्ण कारण से उत्पन्न हो ता शीतल अभ्यग देने चाहिये । इन क्रियाओ से बहिर्माग ( त्वचा एव रक्त धातु ) मे पहुँचा ज्वर शीघ्र शान्त हो जाता है, अगो को सुख मिलता है, रोगी का बल और कान्ति बढती है ॥ १७६ ॥ त्वङ्मात्रशेषा येषा च भवत्यागन्तुरन्वयः ॥ १७७ ॥ इति क्रियाक्रमः सिद्धो ज्वरघ्नः सम्प्रकाशितः । जा ज्वर केवल त्वचा मे ही शेष रह गये हो, या जिन ज्वरो के साथ आगन्तुज अनुबन्ध लगा रहता है, वे जीर्णज्वर धूपन, अजन प्रयाग से शान्त हो जाते हं । यह ज्वरनाशक, फलप्रद चिकित्सा विवि कह दी ॥ १७७ ॥ येषा त्वेष क्रमस्तानि द्रव्याण्यूर्ध्वमतः शृणु ॥ १७८ ॥ रक्तशाल्यादयः शस्ताः पुराणाः षष्टिकैः सह । यवाग्वोदनलाजार्थे ज्वरिताना ज्वरापहाः ॥ १७६ ॥ अम्लाभिलाषी तामेव दाडिमाम्ला सनागराम् । सृष्टविट् पैत्तिको वाऽथ शीता मधुयुता पिबेत् ॥ १८० ॥ लाजपेया सुखजरा पिप्पलीनागरैः शृताम् । पिबेज्ज्वरी ज्वरहरा क्षुद्धानलपामिरादितः ॥ १८१ ॥ पेया वा रक्तशालीना पार्श्वबस्तिशिरोरुजि । श्वदंष्ट्राकण्टकारीभ्या सिद्धा ज्वरहरा पिबेत् ॥ १८२ ॥ ज्वरातिसारी पेया वा पिबेत्साम्ला शृता नरः । पृश्निपर्णीबलाबिल्वनागरोत्पलधान्यकैः ॥ १८३ ॥ शृता विदारीगन्धाद्यैर्दीपनी स्वेदनी नरः । कासी श्वासी च हिक्को च यवागू ज्वरितः पिबेत् ॥ १८४ ॥ विबद्धवर्चाः सयवा पिप्पल्यामलकैः शृताम् । सर्पिष्मती पिबेत्पेया ज्वरी दोषानुलोमनीम् ॥ १८५॥