भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 616 में से

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पृष्ठ 320

३०६ चरकसंहिता [ अ० ३ दोषो को पचाने वाले, तृष्णा अरुचि को नष्ट करते है और मुख की विरसता को मिटाते है । ( २ ) पाच कषाय - १-इन्द्रजौ, परवल, कुटकी । २-परवल, सारिवा, नागरमोथा, पाठा, कुटकी । ३-नीम की छाल, परवल, त्रिफला, मुनक्का नागरमोथा, इन्द्रजौ । ४-चिरायता, गिलोय, लाल चन्दन, सोठ । ५-गिलोय, आवला और मोथा ये आवे श्लोक पर समाप्त होने वाले पाच कषाय क्रमश सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक और चतुर्थक पाचो प्रकार के ज्वरो को नष्ट करते है । ( ३ ) इन्द्रजौ, अमलतास, पाठा, श्वेत वच, कुटकी, मूवो, अतीस, नीम, परवल, बमासा, वच, नागरमोथा, खस, मुलहठी, त्रिफला और बला, इनका क्वाथ या शीत कषाय ज्वरनाशक हे । [ कई आचार्य कुटकी तक एक योग, बमासा तक दूसरा ओर बला तक तीसरा योग मानते है । षड्ग्रन्था से श्वेत वच लेनी चाहिये । ] ( ४ ) महुवे के फूल, मोथा, मुनक्का, गम्भारी की छाल, फालसा, त्रायमाणा, खस, त्रिफला, कुटकी इनको कूट कर रात्रि मे भिगो देना चाहिये । प्रात काल छानकर पीना चाहिये । इसके पीने से ज्वर शीघ्र नष्ट होता है । ( ५ ) छोटी और बडी कटेरी दोना, इन्द्रजौ, मोथा, देवदारु, कोल वल्ली ( चबिका या गज पीपल ) इनका क्वाथ सन्निपात ज्वर को नष्ट करता है । ( ६ ) जाती ( चमेली के पत्ते ), आवला, मोथा, धमासा इनके क्वाथ मे गुड डालकर पीने से रुके हुए दोष शान्त होते है । ( ७ ) त्रिफला, त्रायमाणा ( इन्द्रायण की जड ), मुनक्का, कुटकी, इनका क्वाथ पित्त-कफज्वर को नष्ट करता है । परन्तु यदि मलावरोध हो तो इस क्वाथ मे निशोथ ओर मिलाकर क्वाथ करके इसमे शर्करा मिलाकर पीना चाहिये । वह क्वाथ पित्त- कफज्वर का नाशक तथा मल और वायु का अनुलोमन करता है । ( ८ ) शटी ( कचूर ) पोहकरमूल, छोटी कटेरी, काकडसिंगी, दुरालभा, गिलोय, सोठ, पाठा, चिरायता, कुटकी यह शट्यादि वर्ग है । इससे सन्निपात ज्वर, कास, हृदयरोग, पार्श्व-शूल, श्वास, तन्द्रा नष्ट होती है । इसका क्वाथ प्रयोग करना चाहिये । ( ६ ) बृहत्यादि गण-छोटी और बडी कटेरी दोनो, पोहकरमूल, भार्गी, कचूर, काकडाशृगी, दुरालभा, इन्द्रजौ, परवल कुटकी इनका क्वाथ सन्निपात ज्वर का नाशक तथा कास आदि से युक्त ज्वर मे देना चाहिये । सूत्रस्थान के भेषजचतुष्क अध्यायो मे पिपासा और ज्वर को नाश करने वाले जो कषाय और यवागू कहे है, उनका भी विवेचनापूर्वक प्रयोग वैद्य को करना चाहिये ॥ १६७-२१५ ॥ जैजट ने दो योग माने हैं। चिरायता, मोथा, गिलोय और सोठ को 'चातुर्भद्र' भी कहते है । इनको पृथक् २ या मिलाकर भी प्रयुक्त कर सकते है ।