भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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३०८ चरकसंहिता [ अ० ३ पल, पानी ८ प्रस्थ मे घोल कर घी १ प्रस्थ मे मिलाना चाहिये फिर पकाना चाहिये । मन्द मन्द आग पर पकाने से जब थोडा सा पानी रह जाये तब उतार लेना चाहिये । इसमे आम दोष नष्ट हो जाता है । इसको क्वाथ मे मिलाना चाहिये । इस घृत को पिप्पल्यादि क्वाथ ओर कल्क से दूब के साथ सिद्ध किया जाये तो अधिक उत्तम होगा ] ॥ २१६-२२१ ॥ वासा गुडूची त्रिफला त्रायमाणा यवासकम् ॥ २२२ ॥ पक्त्वा तेन कषायेण पयसा द्विगुणेन च । पिप्पलीमुस्तमृद्वीकाचन्दनोत्पलनागरैः ॥ २२३ ॥ कल्कीकृतैश्च विपचेद्घृतं जीर्णज्वरापहम् । वासाद्य घृत—वासा, गिलोय, त्रिफला, त्रायमाण, जवासा इनके क्वाथ से दुगने (घी से) गाय के दूध के साथ, पिप्पली, माथा, मुनक्का, लाल चन्दन, नीला कमल और सोठ इनके कल्क से घृतपाक करना चाहिये । यह घृत जीर्ण ज्वर को नष्ट करता है । [ गव्य घृत २ प्रस्थ, वासामूल त्वक् का कपाय ४ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ, कल्क १ शराव । अथवा कपाय आठ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ, कल्क १ शराव लेकर भी घृत सिद्ध किया जा सकता है ॥ २२२-२२३ ॥ बला श्वदंष्ट्रा बृहती कलसी धावनी स्थिराम् ॥ २२४ ॥ निम्बं पर्पटक मुस्तं त्रायमाणा दुरालभाम् । कृत्वा कपाय पेष्यार्थे दद्यात्तामलकी शटीम् ॥ २२५ ॥ द्राक्षा पुष्करमूलं च मेदामामलकानि च । घृत पयश्च तत्सिद्धं सर्पिर्ज्वरहरं परम् ॥ २२६ ॥ क्षयकासशिरःशूलापार्श्वशूलासतापनुत् । ज्वरिभ्यो बहुदोषेभ्य ऊर्ध्व चाधश्च बुद्धिमान् ॥ २२७ ॥ दद्यात्संशोधनं काले कल्पे यदुपदेक्ष्यते । बलाद्य घृत—बला (खरैटी), गोखुरू, बडी कटेरी, पृश्निपर्णी, कण्टकारी, शालपर्णी, नीम की छाल, पित्तपापडा, मोथा, त्रायमाणा, दुरालभा इनका क्वाथ ८ प्रस्थ, कल्कार्थ, भूम्यामलकी, कचूर, मुनक्का, पोहकरमूल, मेदा, आवला, मिलित १ शराव, दूध, घृत के सम-परिमाण २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ यथाविधि लेकर पाक करना चाहिये । [कई आचार्य यहा पर घृत से द्विगुण दूध लेते है]। यह घृत ज्वर को नष्ट करता है । क्षय, कास, शिरोवेदना, पार्श्वशूल और अस- वेदना को नष्ट करता है । ज्वर के रोगियों मे यदि दोष की मात्रा अधिक हो तो बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि कल्पस्थान मे वर्णित सशोधनों (वमन और विरेचनों) को समय २ पर देवे ॥ २२४-२२७