चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 352, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ चरकसंहिता [अ० ४ गर्भिणी स्थविर बाल रूक्षाल्पप्रमिताशनम् । अवम्यमविरेच्यं वा यं पश्येद्रक्तपित्तिनम् ॥ ६३ ॥ शोषेण सानुबन्धं वा तस्य सशमनी क्रिया । शस्यते रक्तपित्तस्य परं चातः प्रवक्ष्यते ॥ ६४ ॥ आटरूषकमुद्रीकापथ्याक्वाथः सशर्करः । मधुमिश्रः श्वासकासरक्तपित्तनिबर्हणः ॥ ६५ ॥ आटरूषकनिर्यूहे प्रियङ्गु मृत्तिकाञ्जने । विनीय लोध्रं क्षौद्रं च रक्तपित्तहर पिबेत् ॥ ६६ ॥ पद्मकं पद्मकिञ्जल्कं दूर्वा वास्तुकमुत्पलम् । नागपुष्पं च लोध्रं च तेनैव विधिना पिबेत् ॥ ६७ ॥ प्रपौण्डरीकं मधुक मधु चाश्वशकृद्रसे । यवासभृङ्गरजसोर्मूलं वा गोशकृद्रसे ॥ ६८ ॥ विनीय रक्तपित्तघ्नं पेय स्यात्तण्डुलाम्बुना । युक्तं वा मधुसर्पिभ्यां लिह्याद् गोऽश्वशकृद्रसम् ॥ ६९ ॥ खदिरस्य प्रियङ्गूणा कोविदारस्य शाल्मलेः । पुष्पचूर्णानि मधुना लिह्यान्ना रक्तपैत्तिकः ॥ ७० ॥ शृङ्गाटकाना लाजाना मुस्तखर्जूरयोरपि । लिह्याच्चूर्णानि मधुना पद्मानां केशरस्य च ॥ ७१ ॥ धन्वजानामसृग्लिह्यान्मधुना मृगपक्षिणाम् । सक्षौद्र प्रथिते रक्ते लिह्यात्पारावतं शकृत् ॥ ७२ ॥ जिनका बल और मास क्षीण हो गया हो, जो शाक, भार, वा मुसाफिरी से कृश हो गये हों, आग या सूर्य की गरमी से अथवा रोगा से जो क्षीण हो गया है, गर्भवती,वृद्ध, बालक, रूक्ष, अल्प और नियमित भोजन करने वालो को, जो वमन या विरेचन के अयोग्य हो, यक्ष्मा रोग से पीडित हो तो इनकी सश- मनी चिकित्सा करे । रक्तपित्त रोगी के लिये जो सशमनी क्रिया है, उसका अब उपदेश करते हैं । सशमनी क्रिया — ( १ ) वासा, मुनक्का, हरड के क्वाथ मे शर्करा और मधु मिलाकर देवे । यह श्वास, कास और रक्तपित्त का नाशक है । ( २ ) वासा के क्वाथ मे प्रियगु, मिट्टी, अजन, लोध्र [ मिलित एक कर्ष ] और शहद एक कर्ष मिलाकर पीवे यह रक्तपित्त नाशक है। ( ३ ) इसी प्रकार पद्माख, कमल का केशर, दूर्वा, बथुवा, नीला कमल, नाग केशर, लोध्र, इनका भी