भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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३५४ चरकसंहिता [ अ० ५

दृष्ट्वाऽऽदौ स्वेदयेद्युक्त्या स्विन्नं च विलये१ द्भिषक् ॥ ५२ ॥
कफजन्य गुल्म यदि शीतल, गुरु, स्निग्ध आहारों के कारण उत्पन्न हुआ हो
और रोगी वमन के अयोग्य तथा मन्दाग्निवाला हो तो प्रथम लङ्घन करावे ।
वमन योग्य—जिसकी अग्नि मन्द हो, वेदना भी कम हो, कोष्ठ भारी
और जकडा हो, वमन की अभिरुचि (प्रवृत्ति) होती हो अरुचि रहती हो तो
गुल्म रोगी को वमन के योग्य समझे । वमन और लङ्घन हो चुकने पर रोगी की
उष्ण परिचर्य्या करे । कटु और तिक्त ओषधियो से सिद्ध आहार करावे । यदि
गुल्म मे आनाह, मल, वायु का विबन्ध हो और गुल्म कठिन तथा ऊपर को
उठा हुआ हो तो प्रथम स्वेदन दे शून्य होनेपर अगुली आदि से दबा कर या
मर्दन कर इसको विलीन करे ॥ ४६-५२ ॥
लङ्घनोल्लेखने स्वेदे कृतेऽग्नौ संप्रधुक्षिते ।
कफगुल्मे पिबेत्काले सक्षारकटुकं घृतम् ॥ ५३ ॥
स्थानादपसृतं ज्ञात्वा कफगुल्मं विरेचनैः ।
सस्नेहैर्बस्तिभिर्वाऽपि शोधयेद्दशमूलकैः ॥ ५४ ॥
वृद्धेऽग्नावानिलेऽमूढे२ ज्ञात्वा सस्नेहमाशयम् ।
गुटिकाश्चूर्णनिर्यूहाः प्रयोज्याः कफगुल्मिनाम् ॥ ५५ ॥
कफ गुल्म मे—लङ्घन से, वमन से, स्वेदन से अग्नि को प्रदीप्त करने पर
भोजन-काल मे क्षार और कटु-द्रव्य से युक्त घृत पिलावे । यदि कफ-गुल्म
अपने स्थान से चलायमान हो जाये तो विरेचन द्वारा अथवा स्नेह युक्त दश-
मूल की बस्तियो से सशोधन कर । अग्नि के प्रवृद्ध होने पर, वायु के अनुलोम
होने पर, आमाशय (कोष्ठ) को स्निग्ध हुआ समझ कर, कफ-गुल्म रोगी को
गुटिका, चूर्ण और क्वाथो का सेवन करावे ॥ ५३-५५ ॥
कृतमूलं महावास्तुं कठिनं स्तिमितं गुरुम् ।
जयेत्कफकृतं गुल्मं क्षारारिष्टाग्निकर्मभिः ॥ ५६ ॥
दोषः प्रकृतिगुल्मं तु योगं बुद्ध्वा कफोल्बणे ।
बलदोषप्रमाणज्ञः क्षार गुल्मे प्रयोजयेत् ॥ ५७ ॥
एकान्तरं द्वयन्तरं वा त्र्यहं विश्रम्य वा पुनः ।
शरीरबलदोषाणां वृद्धिक्षपणकोविदः ॥ ५८ ॥
श्लेष्माणं मधुरं स्निग्धं मासक्षीरघृताशिनः ।
भित्त्वा भित्त्वाऽऽशयात्क्षारः३ क्षरत्वात्क्षारयत्यधः ॥ ५९ ॥
१ 'विनयेद्' इति । २ 'मन्दाग्नावानिले मूढे' इति च ।
३. 'ऽऽशयान् क्षार' इति च पाठः ।