चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 372, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५७ धनिया, अम्लवेतस, यवक्षार, चीता, कचूर, वचा, अजगन्धा, छोटी इलायची, तुलसी, इनका कल्क मिलित १ शराव, दही ८ प्रस्थ और घृत २ प्रस्थ लेकर यथाविधि पाक करना चाहिये । यह घृत वात-गुल्म रोगियो के शूल और आनाह को नष्ट करता है ॥ ६६-७० ॥ हबुषाव्योषपृथ्वीकाचव्यचित्रकसन्धवैः ॥ ७१ ॥ साजाजीपिप्पलीमूलदीप्यकैर्विपचेद् घृतम् । मातुलुङ्गदधिक्षीरकोलमूलकदाडिमैः ॥ ७२ ॥ रसैस्तद्वातगुल्मघ्न शूलानाहविमोक्षणम् । योन्यर्शोग्रहणीदोषश्वासकासारुचिज्वरान् ॥ ७३ ॥ बस्ति-हृत्पार्श्वशूल च घृतमेतद् व्यपोहति । इति हबुषाद्य घृतम् ॥ ( ५ ) हबुषाद्य घृत—हबुषा ( हाऊबेर ), त्रिकटु ( सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली ), पृथ्वीका ( हिंगुपत्री या मोटा जीरा ), चविका, चीता, सैन्धव नमक, अजाजी ( जीरा ), पिप्पली मूल, अजवायन मिलित इनका कल्क १ शराव, बिजोरे का रस, दधि, दूध, बेर का क्वाथ, मूली का क्वाथ और अनार का रस प्रत्येक २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ इन से घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत वात-गुल्म को नष्ट करता है, शूल, आनाह को मिटाता है । योनिरोग, अर्श, ग्रहणी, श्वास, कास, अरुचि, ज्वर, बस्तिशूल, हृदयशूल, पार्श्वशूल को यह घृत नष्ट करता है ॥ ७१-७३-॥ पिप्पल्याः१ पिचुरध्यक्षो दाडिमाद् द्विपलं पलम् ॥ ७४ ॥ धान्यात्पञ्च२ घृताच्छुण्ठ्याः कर्षः क्षीरं चतुर्गुणम् । सिद्धमेतैर्धृतं सद्यो वातगुल्म चिकित्सति ॥ ७५ ॥ योनिशूलं शिरःशूलमर्शसि विषमज्वरम् । इति पिप्पल्याद्यं घृतम् । घृतानामौषधगणा य एते परिकीर्तिताः ॥ ७४ ॥ ते चूर्णयोगा वर्त्त्यस्ताः कषायास्ते च गुल्मिनाम् । ( ६ ) पिप्पल्याद्य घृत—घी ५ पल, गाय का दूध २० पल, पिप्पली १॥ पिच्चु, अनारदाना २ पल, धनिया १ पल, सोंठ १ कर्ष इनसे सिद्ध घृत वात-गुल्म, योनिशूल, शिरोवेदना, अर्श और विषम ज्वर को नष्ट करता है । [ चक्रदत्त मे इस घृत का नाम 'पञ्चपल घृत' दिया है । अष्टागसग्रह मे— १ 'पिप्पल्यः पिचु' इति च । २ गगाधर सेन ने 'प्रस्थ घृतात्' पाठ माना है ।