भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १ ] शारीरस्थानम् २५ जीवन्मुक्त दशा में रहता है, मोक्ष में परम मुक्ति हो जाती है ] । आत्मा, इन्द्रिय, अर्थ, और मन के सन्निकर्ष से सुख दुख उत्पन्न होते हैं और जब विषयों से हट कर मन आत्मा में स्थिर हो जाता है, तब कर्मों का आरम्भ न होने से सुख-दुख समाप्त हो जाते हैं और वशित्व उत्पन्न हो जाता है, यही योग का फल है । ⁂ योग को जानने वाले ऋषि शरीर युक्त इस दुख- निवृत्ति रूप स्थिति को योग कहते हैं ॥ १३७-१३६॥ आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थाना छन्दत क्रिया । दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ॥ १४० ॥ इत्यष्टविधमाख्यातं योगिना बलमैश्वरम् । शुद्धसत्त्वसमाधानात्तत्सर्वमुपजायते ॥ १४१ ॥ योगियों का आठ प्रकार का ऐश्वर्य्य—आवेश (दूसरे के शरीर में प्रवेश करना), चित्त का ज्ञान अर्थात् (दूसरे के चित्त को जानना), विषयों का इच्छानुसार करना, इच्छानुसार दर्शन, श्रवण, अतीन्द्रिय और दूर के भी पदार्थों को देखना, शब्दों को सुनना, इच्छानुसार स्मरण (पूर्वजन्म का भी स्मरण), इच्छानुसार रूप बनाना और इच्छानुसार अदृश्य हो जाना यह योगियों का आठ प्रकार का यागजन्य बल है । यह सब शुद्ध सत्त्व, रज और तम से रहित मन को विषयों से हटा कर आत्मा मे लगाने से उत्पन्न होता है ॥ १४०-१४१ ॥ मोक्षो रजस्तमोऽभावाद्वलवत्कर्मसंक्षयात् । वियोगः सर्वसंयोगैरपुनर्भाव उच्यते ॥ १४२॥ रज और तम दो मानस दोष हैं। इनके निवृत्त होने पर और अवश्य भोक्तव्य कर्मा के ( फल भोग द्वारा ) क्षय होने से कर्मबन्धनों से मुक्ति अर्थात् मोक्ष हो जाता है । मोक्ष होने पर फिर जन्म ग्रहण नहीं करना होता, इसी को 'अपुनर्भव' कहते हैं ॥१४२॥ सतामुपासन सम्यगसता परिवर्जनम् । व्रतचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधाः ॥ १४३ ॥ धारण धर्मशास्त्राणा विज्ञानं विजने रतिः । विषयेष्वरतिर्मोक्षे व्यवसायः परा धृतिः ॥ १४४ ॥ कर्मणामसमारम्भः कृताना च परिक्षयः । ⁂ आत्मस्थे मनसि शरीरस्य दुःखाभव स योग. ॥ वै० द० ५ । २ । १६ ॥