भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १ ] शारीरस्थानम् २७ एतत्तदेकमयनं मुक्तैर्मोक्षस्य दर्शितम् । तत्त्वस्मृतिबलं, येन गता न पुनरागताः ॥ १५० ॥ मुक्त पुरुषों ने इस तत्त्वस्मृति के बल को मोक्ष का एक ऐसा श्रेष्ठ मार्ग बताया है जिस मार्ग से गये हुए पुरुष फिर यहा पर वापिस नही आते ॥१५०॥ अयनं पुनराख्यातमेतद्योगस्य योगिभिः । संख्यातधर्मैः सांख्यैश्च मुक्तैर्मोक्षस्य चायनम् ॥ १५१ ॥ योगी पुरुष इस तत्त्वस्मृति के बल को ही योग का मार्ग कहते हैं और सत्यज्ञानी और मुक्त पुरुष इस स्मृतिबल को भी मोक्ष का एक मार्ग कहते हैं ॥ १५१ ॥ सर्वं कारणवद् दुःखमस्वं चानित्यमेव च । न चात्मकृतकं तद्धि तत्र चोत्पद्यते स्वता ॥ १५२ ॥ यावन्नोत्पद्यते सत्या बुद्धिर्नैतदहं यथा । नैतन्मम च विज्ञाय ज्ञः सर्वमतिवर्तते ॥ १५३ ॥ कारणवान् अर्थात् उत्पन्न हाने वाला सम्पूर्ण वस्तुए बुद्धि, अहंकार आदि आत्मा से भिन्न दुःख रूप हैं, वे दुःख उत्पन्न करता हैं और कारणवान् होने से अनित्य है । आत्मा कारण रहित और नित्य है । जो वस्तु कारणवाली होती है, उसमें ममता उत्पन्न होती है । अनात्मा में आत्मबुद्धि 'यह मेरा शरीर, मैं गोरा हूं, मोटा हूं' इस प्रकार का मिथ्याज्ञान तब तक रहता है, जब तक सत्यबुद्धि अर्थात् तत्त्वज्ञान उत्पन्न नही होता । सत्यबुद्धि उत्पन्न हाने पर 'मेरा यह शरीर नहीं, मैं गोरा नहीं' यह ज्ञान हो जाता है । इस ज्ञान के होने पर ज्ञानी जन्म, कर्म आदि सब बन्धनों का अतिक्रमण कर जाता है । तभी सब वेदनाओ ( पीड़ाओं ) की अत्यन्त निवृत्ति होती है ॥ १५२-१५३ ॥ तस्मिंश्चरमसन्यासे समूलाः सर्ववेदनाः । असंज्ञानज्ञानविज्ञाना निवृत्तिं यान्त्यशेषतः ॥ १५४ ॥ इस अन्तिम सन्यास अवस्था में सब कर्मों के परित्याग करने पर मिथ्या ज्ञान रूपी कारणों से उत्पन्न सब वेदनायें, ज्ञेय के भली प्रकार से जान लेने से सम्पूर्ण रूप में निवृत्त हो जाती हैं ॥ १५४ ॥ अतः परं ब्रह्मभूतो भूतात्मा नोपलभ्यते । निःसृतः सर्वभावेभ्यश्चिह्नं यस्य न विद्यते ॥ १५५ ॥ इसके अनन्तर विदेह मोक्ष को प्राप्त करने के पीछे भूतात्मा ( जीव ) सब भावों से निकल कर ब्रह्म रूप हो जाने से कहीं भी उपलब्ध नहीं होता, वह

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