चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 438, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें४५४ चरकसंहिता [अ० ६ ऋषभ और ऋद्धि तथा मेदा इनको परस्पर सम भाग लेकर इनके कल्क से घृतपाक करे, यह महाकल्याणक घृत है ॥ ४६-५१ ॥ जटिला पूतना केशी चारटी मर्कटी वचाम् । त्रायमाणां जया वीरा चोरकं कटुरोहिणीम् ॥ ५२ ॥ कायस्था शूकरी छत्रामतिच्छत्रा पलङ्कषाम् । महापुरुषदान्ता च वयःस्था नाकुलीद्वयम् ॥ ५३ ॥ कटम्भरा वृश्चिकाली स्थिरा चाऽऽहृत्य तैर्घृतम् । सिद्धं चातुर्थकोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ५४ ॥ महापैशचिक नाम घृतमेतद्यथाऽमृतम् । बुद्धिस्मृतिकरं चैव बालाना चाङ्गवर्धनम् ॥ ५५ ॥ इति महापैशचिकं घृतम् । (४) महापैशचिक घृत—जटिला (जटामासी), पूतना (हरड), केशी (भूतकेशी), चारटी (पद्मचारिणी अथवा ब्रह्मयष्टि), कर्कटी (कौच), वच, त्रायमाणा, जया (अरण्डि), वीरा (पृश्निपर्णी या काकोली), चोरक (सुगन्धित द्रव्य, इसे भूटानी लोग बेचते है) कुटकी, कायस्था (सुरसा वा क्षीरकाकोली), शूकरा (वाराही कन्द वा विधारा), छत्रा (धनिया), अतिच्छत्रा (सौंफ), पलङ्कषा (लाख या गुग्गुल), महापुरुषदान्ता (शतावरी), वयस्था (आवला), नाकुली द्वय (दोनो रास्ना अथवा सपाक्षी और सर्पगन्धा), कटम्भरा (कटभी), वृश्चिकाली (बिच्छू बूटी), स्थिरा (शालपर्णी), इन को लाकर इनके क्वाथ और कल्क से घृत सिद्ध करे । यह घृत चतुर्थक ज्वर उन्माद, ग्रह, अपस्मार को नष्ट करता है। यह महापैशार्चिक नामक घृत अमृत के समान बुद्धि, स्मृति- कारक, तथा नालको के अगो को बढाने वाला है ॥ ५२-५५ ॥ लशुनाना शतं त्रिशदभया त्र्यूषणात्पलम् । गवा चर्ममसीप्रस्थमाढकं क्षीरमूत्रयोः ॥ ५६ ॥ पुराणसर्पिषः प्रस्थमेभिः सिद्धं प्रयोजयेत् । हिङ्गुचूर्णपलं शीते दत्त्वा च मधुमाणिकाम् ॥ ५७ ॥ तद्दोषगन्तुसम्भूतालुन्मादान्विषमज्वरान् । अपस्मारांश्च हन्त्याशु पानाभ्यञ्जननावनैः ॥ ५८ ॥ इति लशुनाद्यं घृतम् । (५) लशुनाद्य घृत—लहसुन एक सौ, हरड़ तीस, मिलित सोठ, मरिच, पिप्पली एक पल, गाय का चमड़ा जलाकर तैयार की राख एक प्रस्थ, गाय