भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १० ] ३० चिकित्सितस्थानम् ४६५ वातिकं बस्तिभूयिष्ठैः पैत्तं प्रायो विरेचनैः । श्लैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् १ ॥ १५ ॥ चिकित्सा—वैद्य को चाहिये कि प्रथम अपस्मार के उत्पन्न होने पर ही तीक्ष्ण वमन आदि कार्यों द्वारा हृदयवह तथा मनोवह स्रोतों को रोकने वाले शारीरिक तथा मानसिक दोषो को निकाल कर हृदयवह और मनोवह स्रोतों का प्रबोधन करे। वातिक अपस्मार मे बस्ति कर्म, पैत्तिक में विरेचन कर्म और श्लैष्मिक अपस्मार मे वमन कर्म प्रधानत करने चाहियें, और शेष कर्म भी करने चाहिये ॥ १४-१५ ॥ सर्वतः सुविशुद्धस्य सम्यगाश्वासितस्य च । अपस्मारविमोक्षार्थं योगान्संशमनाञ्छृणु ॥ १६ ॥ जिस समय ऊर्ध्व ( ऊपर के ) और अध ( नीचे के ) सब मार्गों का शोधन हो जाये, और भली प्रकार अन्न-सेवन आदि से शरीर मे बल आ जावे, तब अपस्मार को शान्त करने के लिये जिन निम्नलिखित योगों को बरतना चाहिये उनको सुनो ॥ १६ ॥ गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैः समैर्घृतम् । सिद्धं पिबेदपस्मारकामलाज्वरनाशनम् ॥ १७ ॥ इति पञ्चगव्यं घृतम् । ( १ ) पञ्चगव्य घृत—गाय के गोबर का रस, गाय का दही, गाय का दूध, गाय का मूत्र इनके बराबर गाय का घृत लेकर घृतपाक-विधि से सिद्ध करे । यह घृत अपस्मार, कामला आर ज्वर को नष्ट करता है ॥१७॥ द्वे पञ्चमूल्यौ त्रिफला रजन्यौ कुटजत्वचम् । सप्तपर्णमपामार्गं नीलिनीं कटुरोहिणीम् ॥१८॥ सम्पाकं फल्गुमूलं च पौष्करं सदुरालभम् । द्विपलानि जलद्रोणे पक्त्वा पादावशेषिते ॥ १९ ॥ भार्गीं पाठां त्रिकटुका त्रिवृता निचुलानि च । श्रेयसीमाढकीं मूर्वा दन्ती भूनिम्बचित्रकौ ॥ २० ॥ द्वे सारिवे रोहिषं च भूतीकं मदयन्तिकाम् । क्षिपेत्पिष्ट्वाऽक्षमात्राणि तैः प्रस्थं सर्पिषः पचेत् ॥ २१ ॥ गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैश्च तत्समैः । पञ्चगव्यमिति ख्यातं महत्तदमृतोपमम् ॥ २२ ॥ १ 'समाचरेत्' इति च ।