चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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४७० चरकसंहिता [ अ० १०
चतुर्थांश, सरसो या तिल का तैल एक भाग, बकरे का मूत्र चार भाग लेकर
तैल सिद्ध करे । इसका नस्य लेने से अपस्मार-रोग नष्ट होता है ॥ ४२-४३ ॥
पिप्पली वृश्चिकाली च कुष्ठं च लवणानि च ।
भार्गी च चूर्णितं नस्तः कार्यं प्रधमनं परम् ॥ ४४ ॥
(४) पिप्पली, वृश्चिकाली (बिच्छू बूटी), कूठ ओर पांचो नमको मे से
जो मिले और भार्गी इन सब का चूर्ण करके नाक मे फूक द्वारा नस्य देना
चाहिये । यह एक उत्तम औषध है ॥ ४४ ॥
कायस्थाञ्छारदान्मुद्गान्मुस्तोशीरयवास्तथा ।
सव्योषान् बस्तमूत्रेण पिष्ट्वा वर्तीः प्रकल्पयेत् ॥ ४५ ॥
अपस्मारे तथोन्मादे सर्पदष्टे गरार्दिते ।
विषपीते जलमृते चैताः स्युरमृतोपमाः ॥ ४६ ॥
अञ्जन—(१) कायस्था (तुलसी या छोटी इलायची), शरद्-ऋतु मे
उत्पन्न मूग (हरे मूग), मोथा, उशीर (खस), जौ, त्रिकटु (सोठ, मरिच,
पिप्पली) इन सब को बकरे के मूत्र मे पीस कर नेत्राञ्जन वर्त्ती बनावे। अपस्मार,
उन्माद, साप का काटा, अर्दित-वात, विषपान, गर (सयोगज विष) से
पीडित और जलमृत अर्थात् जल मे डूबा पुरुष (पेट मे बहुत पानी जाने से
जो मृत के तुल्य हो)१ उसके लिये ये वर्तिया अमृत के समान जीवनप्रद
होती है ॥ ४५-४६ ॥
मुस्तं वयःस्था त्रिफला कायस्था हिङ्गु शाद्वलम् ।
व्योषं माषान् यवान्मूत्रैर्बास्तमेषभभंस्त्रिभिः ॥ ४७ ॥
पिष्ट्वा कृत्वा च ता वर्तिमपस्मारे प्रयोजयेत् ।
किलासे च तथोन्मादे ज्वरेषु विषमेषु च ॥ ४८ ॥
(२) मोथा, वयस्था (गिलोय), त्रिफला, कायस्था (हरड़), हींग,
शाद्वल (दूब, नई घास), सोठ, मरिच पीपल, उड़द और जौ इनको बकरे,
बैल और मेढ़े के मूत्र मे पीसकर (तीनो के मूत्र से) नेत्राञ्जन वर्त्ती बनावे ।
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१ जलमग्न पुरुष के लक्षण--
विष्टब्धपायुमूर्वाक्षमाध्मातोदरमेहनम् ।
विद्याज्जलमृत जन्तु शीतपादकराननम् ॥
गुदा, सिर, आखे अकड जावे, पेट और लिंग फूल जावे, पैर, हाथ और
मुख ठण्डे पड जावे उसे जलमृत पुरुष जाने ।