चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 480, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें४६६ चरकसंहिता [ अ० १२
त्रिभागशेषं तु सुपूतशीतं द्रोणेन तत्राकृतमस्तुना च। सितोपलायाश्च शतेन युक्तं लिप्ते घटे चित्रकपिप्पलीभ्याम् ॥३०॥ वैहायसे स्थापितमादशाहात्प्रयोजयस्तद्विनिहन्ति शोफान् । भगन्दराशः क्रिमिकुष्ठमेहान्वैवर्ण्यकार्श्यानिलहिक्कनं च ॥ ३१ ॥ इति गण्डीराद्यरिष्टः ।
(६) गण्डीराद्यरिष्ट—गण्डीर (रामठ), भलावा, चित्रक, सोंठ, मरिच, पिप्पली, बडी आर छोटी कटेरी के फल प्रत्येक दो प्रस्थ काटकर छोटे २ टुकड़े कर लेवे। कांजी और मस्तु का एक द्रोण लेकर उपलो की आग पर पकावे। जब एक तृतीयांश रह जाय तब वस्त्र से छान कर शीतल कर ले। उसमे प्राकृत मस्तु (दधि मस्तु) का एक द्रोण और मिश्री १०० पल मिला देवे। फिर चित्रक और पिप्पली का बडे से लेप करके उस घट मे इसको रख दे। फिर इस घडे को दस दिन तक खुले आकाश मे लटकते हुए छिके पर रख देवे। पीछे से जब इसमे गन्ध आ जाये तब इसको बरते। इस अरिष्ट के प्रयोग से भगन्दर, शाफ अर्श, कमि, कुष्ठ, प्रमेह, विवर्णता, कृशता ओर वातज हिचकी नष्ट होती है१ ॥ २६-३१ ॥
काश्मर्यधात्रीमरिचाभयाना द्राक्षाफलाना च सपिप्पलीनाम् । शत शतं क्षौद्रगुडात्पुराणात्तुला तु२ कुम्भे मधुना प्रलिप्ते ॥ ३२ ॥ सप्ताहमुष्णे द्विगुणं तु शीते स्थितं जलद्रोणयुतं पिबेन्न। । शोफान्विबन्धन्कफवातजांश्च स हन्त्यरिष्टोऽष्टशतोऽग्निकृच्च ॥ ३३ ॥ इत्यष्टशतोऽरिष्टः ।
(१०) अष्टशतारिष्ट—गम्भारी, आवला, मरिच, हरड़, बहेड़ा, द्राक्षा इनके फल और पिपली प्रत्येक सो, पुराना क्षुद्रगुड़ (राब) १ तुला (१०० पल) इनको एक द्रोण पानी मे मिलाकर मधु से लिपे हुए घडे मे डाल कर ग्रीष्म-ऋतु मे सात दिनों तक और शीत ऋतु मे १५ दिन तक रख देवे३।
१ अष्टागसंग्रह मे यही योग भल्लातकारिष्ट के नाम से दिया है उसमे गण्डीर का योग नही है — 'भल्लातकचित्रकविडङ्गबृहतीफलानि पृथग् द्विप्रस्थाशान्यच्छधान्याम्व्ळद्रोणे गोमयाग्निना पक्वमित्यादि । २ 'जीर्णगुडात्तुलाच सक्षुद्र' इति पाठः । ३ वाग्भट में—त्रिफलामरिचद्राक्षापिप्पलीकाश्मर्यफलानां प्रत्येक शतं गुड- तुलामूदकद्रोण च मधुलिप्तभाजनस्थ सप्ताहमुष्णे काले धारयेत् ॥ (अष्टागसग्रह, चिकि० १६) ।