भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० २ ] शारीरस्थानम् ३५ उत्पन्न वासना के अनुकूल इस जन्म में होता है । [अर्थात् यदि देव शरीर मे ही वह आत्मा तुरन्त इस देह मे आवे तो उसका चित्त देवतुल्य, राक्षस शरीर से आवे तो चित्त राक्षसतुल्य और पशु शरीर मे आवे तो पशुतुल्य होता है ] ॥ २६-२७ ॥ कस्मात्प्रजा स्त्री विकृता प्रसूते हीनाधिकाङ्गीं विकलेन्द्रिया च । देहात्कथं देहमुपैति चान्यमात्मा सदा कैरनुबध्यते च ॥ २८॥ प्रश्न—(१) स्त्री किस कारण से विकृत रूपवाली प्रजा को उत्पन्न करती है ? (२-३) किस कारण से हीन अथवा अधिक अङ्गोंवाली प्रजा को उत्पन्न करती है ? (४) किस कारण से विकल इन्द्रियोंवाला प्रजा को उत्पन्न करती है ? (५) किस प्रकार से आत्मा इस शरीर मे दूसरे में पहुँचता हैं ? (६) सदा आत्मा किन २ से बन्धा रहता है ? ॥ २८ ॥ बीजात्मकर्माशयकालदोषैर्मातुस्तथाऽऽहारविहारदोषैः । कुर्वन्ति दोषा विविधानि दुष्टाः सस्थानवर्णेन्द्रियवैकृतानि ॥२९॥ बीज (शुक्र शोणित), आत्मा के अपने कर्म, गर्भाशय और काल इनके दोषो से तथा माता क आहार-विहार के दोषों से दूषित हुए दोष वात आदि सस्थान (रचना), वर्ण, इन्द्रिय आदि में नाना प्रकार के विकार उत्पन्न कर देते हैं ॥ २९ ॥ वर्षासु काष्ठाश्मघनाम्बुवेगास्तरोः सरित्स्रोतसि संस्थितस्य । यथैव कुर्युर्विकृति तथैव गर्भस्य कुक्षौ नियतस्य दोषाः ॥३०॥ जिस प्रकार वर्षा मे काठ, पत्थर और बरसात का पानी ये तीनों मिल कर नदी की धार में स्थित वृक्ष में विकार उत्पन्न कर देते है, इसी प्रकार तीनों दूषित दोष कर्म वश से गर्भाशय में स्थित गर्भस्थ जीव के शरीर में विकृति उत्पन्न कर देते हैं ॥ ३० ॥ भूतैश्चतुर्भिः सहितः सुसूक्ष्मैर्मनोजवो देहमुपैति देहात् । कर्मात्मकत्वान्न तु तस्य दृश्यं दिव्यं विना दर्शनमस्ति रूपम् ॥३१॥ यह आत्मा कर्मों क कारण आकाश को छोड़ कर शेष वायु, जल, अग्नि और पृथिवी इन चार सूक्ष्म भूतों (तन्मात्रो) के साथ लिंग शरीर रूप मे मन के वेग से एक देह दूसरे देह मे जाता है । अर्थात् मरने वाले देह से निकल कर अगले उत्पन्न होने वाले देह में जाता है । वह कर्मात्मक होने से, दिव्य चक्षुओं के बिना इसके सूक्ष्म रूप का दर्शन नहीं होता ॥ ३१ ॥ ॐ गीता मे भी कहा है—न तु मां शक्यसे द्रष्टु अनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥