भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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५१८ चरकसंहिता [ अ० १३ विषैश्च मन्दैर्वाताद्याः कुपिताः संचितास्त्रयः । शनैः कोष्ठे प्रकुर्वन्तो जनयन्त्युदरं नृणाम् ॥ ३३ ॥ सन्निपातोदर के कारण—दुर्बल अग्नि वाला पुरुष जब अपथ्य ( अहित, अध्यशन या विषमाशन ) आदि सेवन करे या आम ( अपक्व आहार रस ) अथवा विरोधी अन्न या गुरु भोजन का सेवन करे वा दुष्ट स्त्रियो द्वारा दिये रज, रोम, मल, मूत्र, अस्थि, नख आदि से मिले, अन्न को खावे, वा मन्द विषो ( दूषीविष आदि ) से, वातादि तीनो दोष कुपित होकर धीरे-धीरे कोष्ठ मे संचित होकर उदर रोग को उत्पन्न करते हैं १॥ ३२-३३ ॥ तस्य रूपाणि—सर्वेषामेव दोषाणा समस्तानि लिङ्गान्युपल- भ्यन्ते वर्णांश्च नखादिषु, उदरमपि नानावर्णराजीसिरासन्ततं भव- त्येतत्सन्निपातोदरं विद्यात् ॥ ३४ ॥ सन्निपातोदर के लक्षण—इस सन्निपातोदर मे सब दोषा के मिलेत लक्षण मिलते हे । नख, आख, त्वचा आदि मे सब रंग दिखाई देते हैं । पेट पर भी नाना प्रकार की रेखाये आर सिराये फैली होती हैं । इसको सन्निपातोदर कहते है । [ सुश्रुत मे इसको दूष्योदर कहा है, यह असाध्य हैं ] ॥ ३४ ॥ अशितस्यातिसङ्क्षोभाद्यानयानातिचेष्टितैः । अतिव्यवायभाराध्ववमनव्याधिकर्शनैः ॥ ३५ ॥ वामपार्श्वाश्रितः प्लीहा च्युतः स्थानात्प्रवर्धते । शोणितं वा रसादिभ्यो विवृद्धं तं विवर्धयेत् ॥ ३६ ॥ इति ॥ प्लीहोदर—अति भोजन करने वाले पुरुष मे घोड़ा, गाड़ी की सवारी अथवा अति घूमने के कारण सङ्क्षोभ उत्पन्न होने से, अति मैथुन से, भार उठाने से, अधिक मुसाफिरी से, वमन से, रोगजन्य कृशता से, बाये पार्श्व मे स्थित प्लीहा अपने स्थान से खिसक कर बढ़ने लगती है । इनकी वृद्धि मे कारण बढे हुए रक्त ओर रस आदि है, जो कि अपने आश्रय को बढ़ाते है ॥ ३५-३६ ॥ तस्य प्लीहा कठिनोऽष्ठीलेवादौ वर्धमानः कच्छपसंस्थान उपलभ्यते, १ सुश्रुत मे कहा है— स्त्रियोऽन्नपान नखरोममूत्रविङार्त्तवैर्युक्तमसाधुवृत्ताः । यस्मै प्रयच्छन्त्यरयो गराश्च दुष्टाम्बुदूषीविषसेवनाद् वा ॥ तेनाशु रक्तं कुपिताश्च दोषा कुर्वन्ति घोर जठरं त्रिलिङ्गम् । प्रकीर्त्तित दूष्योदरम् ॥ सु० नि० ७ वा ॥