भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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५२८ चरकसंहिता [ अ० १३ करे । इस सिद्ध घृत का नित्य प्रति उपयोग करने से प्लीहा रोग, गुल्म, उदर, श्वास, कृमि, पाण्डुरोग और कामला शीघ्र शान्त होते है ॥ ८३-८५ ॥ अग्निकर्म च कुर्वीत भिषग्वातकफोल्बणे । पैत्तिके जीवनीयानि सर्पींषि क्षीरबस्तयः ॥ ८६ ॥ रक्तावसेकः संशुद्धिः क्षीरपानं च शस्यते । यूषैर्मांसरसैश्चापि दीपनीयसमायुतैः ॥ ८७ ॥ लघून्यन्नानि संसृज्य भजेत्प्लीहोदरी नरः । (५) यदि प्लीहोदर इस चिकित्सा से शान्त न हो और वात-कफ की प्रधानता हो तो गुल्म के समान अग्निकर्म करना चाहिये । पित्तजन्य प्लीहोदर मे जीवनीगण से सिद्ध घृत तथा दूध की बस्तियो का उपयोग करना चाहिये । साथ ही रक्त मोक्षण, विरेचन और दूध पान कराना उत्तम है। प्लीहोदर में पेयादि क्रम करने के उपरान्त दीपनीय द्रव्यो से संस्कृत यूष, मास रस और लघु अन्न देने चाहिये । यकृद्-उदर मे प्लीहोदर के समान ही औषध का प्रयोग करना चाहिये ॥ ८६-८७-॥ स्विन्नाय बद्धोदरिणे मूत्रतीक्ष्णौषधान्वितम् ॥ ८८ ॥ सतैललवणं दद्यान्निरूहं सानुवासनम् । परिस्रंसीनि चान्नानि तीक्ष्णं चैव विरेचनम् ॥ ८९ ॥ उदावर्त्तहरं कर्म कार्यं वातघ्नमेव च । (६) बद्ध गुदोदर की चिकित्सा—रोगी को स्वेदन कराके तीक्ष्ण ओष- धियो से युक्त मूत्र, तैल, लवण मिश्रित निरूह और अनुवासन देना चाहिये । विरेचक गुण वाले अन्न और तीक्ष्ण विरेचन देने चाहियें । उदावर्त्त-नाशक तथा वात-नाशक कर्म सब इसमे बरतने चाहिये ॥८८-८९॥ छिद्रोदरमृते स्वेदाच्छ्लेष्मोदरवदाचरेत् ॥ ९० ॥ जातं जातं जलं स्राव्यमेवं तत्पातयेद्भिषक् । (७) छिद्रोदर की चिकित्सा—छिद्रोदर मे स्वेदन को छोड़ कर शेष चिकित्सा कफोदर के समान करनी चाहिये । इस प्रकार से जब २ जल उत्पन्न हो तब २ उसको बार बार निकालते रहना चाहिये । [जब तक उपद्रव उत्पन्न न हो तब तक यह रोग याप्य है। उपद्रव उत्पन्न होनेपर असाध्य हो जाता है]॥६०॥ तृष्णाकासज्वरातं तु क्षीणमांसाग्निभोजनम् ॥ ९१ ॥ वर्जयेच्छ्वासिनं तद्वच्छूलिनं दुर्बलेन्द्रियम् । असाध्य छिद्रोदर—रोगी को प्यास, कास, ज्वर हो, रोगी की अग्नि, मांस