भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 523

अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३६ स्तैमित्यारुचिहृल्लासेष्वल्पानौ मद्यपाय च॑१ ॥ १५५ ॥ अरिष्टान् दापयेत्२ क्षारान्कफस्त्यानस्थिरोदरे । श्लेष्मणो विलयार्थं तु दोषं वीक्ष्य भिषग्वरः ३ ॥ १५६ ॥ (६) वैद्य को चाहिये कि स्तिमितता (गीले वस्त्र से आच्छादित की भाति ), अरुचि, जी मचलना, अग्नि मान्द्य, रोगी के मद्यपी होने पर कफजन्य उदर यदि कठिन ओर स्थिर हो ता कफ के विलयन के लिये अरिष्टो का प्रयोग करे ॥ १५५-१५६ ॥ पिप्पली तिल्वकं हिङ्गु नागर हस्तिपिप्पलीम् । भल्लातकं शिग्रुफल त्रिफला कटुरोहिणीम् ॥ १५७॥ देवदारु हरिद्रे द्वे सरलातिविषे वचाम् । कुष्ठं मुस्तं तथा पञ्च लवणानि प्रकल्प्य च ॥ १५८ ॥ दधिसर्पिर्वसातैलमज्जयुक्तानि दाहयेत् । अन्नादूर्ध्वमतः क्षाराद्विडालकपदं पिवेत् ॥ १५६ ॥ मदिरादधिमण्डोष्णजलारिष्टसुरासवैः । (१०) पिप्पली, तिन्दुक, हींग, साठ, गजपिप्पली, भिलावा, सहजन का फल, त्रिफला, कुटकी, देवदारू, हल्दी, दारुहल्दी, सरला, अतिविषा (अतीस), स्थिरा (शालिपर्णी), कूठ, मोथा और पाचो नमक (सैन्धव, सचल, सामुद्र, विड् ओर उद्भिद्) ये सब द्रव्य समान भाग लेकर इनको दही, घी, वसा, मज्जा, ओर तेल म मिला करके [हाण्डी मे बन्द कर उपलो मे रखकर ] जलाना चाहिये ॥ १५७-१५६ ॥ हृद्रोगं श्वयथु गुल्मं प्लीहार्शोजठराणि च ॥ १६० ॥ विषूचिकामुदावत्त वाताष्ठीला च नाशयेत् । भाजन के पीछे इस क्षार की एक कर्ष-मात्रा का मादरा, दधि-मस्तु, गरम जल, अरिष्ट, सुरा या आसव किसी एक वस्तु मे घोल कर पीना चाहिये । यह क्षार हृदयरोग, शाथ, गुल्म, प्लीहा, अर्श, उदर-रोग, विसूचिका, उदावर्त्त और वाताष्ठीला का नष्ट करता है४ ॥१६०॥ १. 'मद्यपस्तथा' इति च । २ 'अरिष्टान् वा पिवेत्' इति च । ३. इति श्लोकार्धं क्वचिद् नापि पठ्यते । ४ वाताष्ठीला—"नामेरधस्तात् सजातः सञ्चारी यदि वाचलः । अष्ठीलावद् घनो ग्रन्थिरूर्ध्वमायात उन्नतः । वाताष्ठीला विजानीयात् ॥ निदान० ॥