भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 526

५४२ चरकसंहिता [ अ० १३ क्रियातीते त्रिदोषे च जठरे चाप्रशाम्यति ॥ १७४ ॥ ज्ञातीन्सुहृदो दारान्ब्राह्मणान् नृपतीन् गुरून् । अनुज्ञाप्य भिषक्फर्म विदध्यात्संशय ब्रुवन् ॥ १७५ ॥ (१८) सन्निपातादर मे तथा जिस उदररोग मे सम्पूर्ण चिकित्सा विधि करने पर भी रोग शान्त न हो तो वैद्य का चाहिये कि सम्बन्धियो को, मित्रो का, स्त्रियो को, ब्राह्मणो को, राजा को और पूज्यजनो को सूचित करके निम्न कार्य करे ॥ १७४-१७५ ॥ अक्रियायां ध्रुवो मृत्युः क्रियायां संशयो भवेत् । एवमाख्याय तस्येदम॑नुज्ञातः सुहृद्गणैः१ ॥ १७६ ॥ पानभोजनसंयुक्तं विषमस्मै प्रदापयेत् । यस्मिन्वा कुपितः सर्पो विसृजेद्धि फले विषम् ॥ १७७ ॥ भक्षयेत्तदुदरिण प्रविचार्य भिषग्वरः२ । तेनास्य दोषसङ्घातः स्थिरो लीनो विमार्गगः ॥ १७८ ॥ सबों को सूचित करदे कि चिकित्सा के न करने पर तो मृत्यु अवश्यम्भावी है, चिकित्सा करने पर जीवन का सन्देह है, शायद बच भी जाये । इस प्रकार कहकर मित्रों से आज्ञा लेकर वैद्य पीने मे और भोजन में स्थावर-विष का प्रयोग करे । इसके लिये अश्वमारक (कनेर), रत्तिया, काकादनी-मूल के कल्क को मद्य के साथ देना चाहिये । अथवा कुपित कृष्ण सर्प जिस फल को काटे, जिसमे विष छोड देवे, उस फल को विचार कर उदर रोगी को खाने के लिये देना चाहिये । [ यह देख लेना चाहिये कि फल मे विष की मात्रा अधिक तो नही है, इसके लिये किसी पशु या पक्षी को खिलाकर देख लेना चाहिये] ॥१७६-१७८॥ विषेणाशु प्रमाथित्वादाशु भिन्नः प्रवर्तते । विषेण हृतदोष त शीताम्बुपरिषेचितम् ॥ १७९ ॥ पाययेत भिषग् दुग्धं यवागू वा यथाबलम् । त्रिवृन्मण्डूकपर्ण्योश्च शाकं सयववास्तुकम् ॥ १८० ॥ भक्षयेत्कालशाकं वा सुरसोदकसाधितम् । निरम्ललवणस्नेहं स्विन्नास्विन्नमनन्नभुक् ॥ १८१ ॥ मासमेकं ततश्चैव तृषितः स्वरसं पिबेन् । १ इत्यर्ध. श्लोक केषुचित् पुस्तकेषु न पठ्यते । २ 'प्रदापयेत्' इति वा पाठः ।

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान) · पृष्ठ 526, कुल 616 में से · BharatKosha