चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 528, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें५४४ चरकसंहिता [ अ० १३ छिद्रोदर मे छिद्रयुक्त आतो को निकाल कर इनकी परीक्षा करके शर्करादि को हटा कर, अन्त स्त्राव का शोधन करके, छिद्रयुक्त स्थान पर बड़ी-बड़ी चिऊटियो से कटवाना चाहिये । इनके काटने से जगह मिल जायेगी । जिस समय अच्छी प्रकार से चिऊटिया काट ल ता उनका काट कर बाहर निकाल देना चाहिये । इनके शिर को वहा लगा रहने देना चाहिये । फिर आतो को यथास्थान रख कर कुक्षि के बाह्य व्रण को सूई से सी देना चाहिये। [ चिउटियो या मकाडो को काटने का प्रकार यह है कि आत का जो भाग चिरा हो उसके चर्म भागो को एक साथ निउटी के खुले चिमटो मे पकड़ादे और चिउटी का धड काट दे, शिर भाग वहा ही चिपटा रहेगा १ ] ॥१८६-१८७॥ तथा जातोदकं सर्वमुदरं व्यधयेद्भिषक् । वामपार्श्वे त्वधो नाभेनार्डी दत्त्वा च गालयेत् ॥ १८८ ॥ निःस्त्राव्य च विमृज्येतद्वेष्टयेद्वाससोदरम् । तथा बस्तिविरेकाद्यैर्म्लानं सर्वं च वेष्टयेत् ॥ १८९ ॥ पेट मे पानी भरने पर व्रण का वेधन करना चाहिये । इसके लिये नाभि से नीचे वाम भाग मे चार अगुल स्थान छोड़ कर वधन करना चाहिये । फिर नाड़ी लगा कर सब दोषदक का निकाल लेना चाहिये । उदर को मल कर सब पानी निकाल लेना चाहिय, फिर नाड़ी को निकाल कर उदर को मजबूत वस्त्र से बाध देना चाहिये । इसी प्रकार बस्ति या विरेचन आदि दोष निःसारक कार्य से म्लान हुए रोगी के उदर को वस्त्र से बाध देना चाहिये, इससे वायु अफारा नही करती ॥ १८८-१८६ ॥ निःस्रुते लङ्घितः पेयामस्नेहलवणा पिबेत् । अतः परं च षण्मासान् क्षीरवृत्तिर्भवेन्नरः ॥ १९० ॥ त्रीन् मासान् पयसा पेयां पिबेत्त्रींश्चापि भोजयेत् । १ सुश्रुत मे विस्तार से विधि दी है यथा— बद्धगुदे परिस्राविणि च स्निग्धस्विन्नाभ्यक्तस्याधोनाभेर्वामतश्चतुरङ्गुलमपहाय रोमराज्या उदर पाटयित्वा चतुरङ्गुलप्रमाणान्यन्त्राणि निष्कृष्य निरीक्ष्य बद्ध- गुदस्य अन्नप्रतिरोधकरमश्मान वाल वाऽपोह्य मलजात वा ततो मधुसर्पिर्भ्यामभ्य- ज्यान्त्राणि यथास्थान स्थापयित्वा बाह्य व्रणमुदरस्य सीव्येत् ॥ परिस्राविण्यप्येव- मेव शल्यमुद्धृत्यान्त्रस्त्रावान् संशोध्य सच्छिद्रमन्त्र समाधाय कालपिपीलिकाभिर्दश- येत् । दष्टे च तासा कायानपहरेत् न शिरांसि। ततः पूर्ववत् सीव्येत् ॥सु०चि०१४॥