चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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५६८ चरकसंहिता [अ० १४
गण्डीरं पिप्पलीमूलं व्योषं चव्यं च चित्रकम् ।
पिष्ट्वा कषाये विनयेत्पूते द्विपलिकं पृथक् ॥ ११५ ॥
पलानि सर्पिषस्तस्मिंश्चत्वारिंशत्प्र दापयेत् ।
चाङ्गेरीस्वरसं तुल्यं सर्पिषा दधि षड्गुणम् ॥ ११६ ॥
मृद्वग्निना ततः साध्यं सिद्धं सर्पिर्निधापयेत् ।
तदाहारे विधातव्यं पाने प्रायोगिके विधौ ॥ ११७ ॥
ग्रहणीशोविकारघ्नं गुल्महृद्रोगनाशनम् ।
शोथप्लीहोदरानाहमूत्रकृच्छ्रज्वरापहम् ॥ ११८ ॥
कासहिक्कारुचिश्वाससूदनं पार्श्वशूलनुत् ।
बलपुष्टिकरं वर्ण्यमग्निसंदीपनं परम् ॥ ११९ ॥
इति पिप्पल्याद्यं घृतम् ।
(२७) पिप्पल्याद्य घृत—पिप्पली, सोंठ, पाठा और गोखरू प्रत्येक
द्रव्य तीन पल लेकर क्वाथ-विधि से क्वाथ करना चाहिये । इस क्वाथ मे
गण्डीर, पिप्पलीमूल, व्योष, (त्रिकट), चव्य, चित्रक प्रत्येक आधा पल लेकर
पीस कर कल्क रूप मे मिला देना चाहिये । साथ मे घी ४० पल, चागेरी का
स्वरस ४० पल, दही २४० पल मिला कर मृदु अग्नि पर पाक करना चाहिये ।
इस प्रकार से सिद्ध घृत को प्रति-दिन खान-पान मे बरतना चाहिये । यह घृत
ग्रहणी, अर्शारोग, गुल्म, हृदय रोग, शोथ, प्लीहा, उदर, आनाह, ज्वर, मूत्र-
कृच्छ्र, कास, हिचकी, अरुचि, श्वासपीड़ा, ओर पार्श्वशूल को नष्ट करता है ।
यह बलकारक, पुष्टिदायक, कान्तिवर्धक और अग्निदीपक है ॥११४-११६॥
सगुडां पिप्पलीयुक्तां घृतभृष्टां हरीतकीम् ।
त्रिवृद्दन्तयुतां वाऽपि भक्षयेदानुलोमिकीम् ॥ १२० ॥
विड्वातकफपित्तानामानुलोम्येन निर्मले ।
गुदेऽर्शांसि प्रशाम्यन्ति पावकश्चाभिवर्धते ॥ १२१ ॥
पिप्पली से युक्त घी मे भुनी त्रिवृत् (निशोथ), दन्ती से युक्त हरड़ को
वायु और मल के अनुलोमन के लिये सेवन करे ।
वायु मल, कफ, पित्त का अनुलोमन होने पर, गुदा के स्वस्थ होने से अर्श
स्वयं शान्त हो जाते हैं और अग्नि बढती है ॥ १२०-१२१ ॥
बर्हिंतित्तिरिलावानां रसानम्लान् सुसंस्कृतान् ।
दक्षाणां वर्तकानां च दद्याद्विड्वातसंग्रहे ॥ १२२ ॥
(२८) मल और वायु का अवरोध होने पर मोर, तीतर, बटेर इनके मास-