चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 560, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें५७६ चरकसंहिता [अ० १४ और ऊरु मे दर्द होता हो, निर्बलता अधिक हो, अर्श रोग का कारण रूक्ष हो तो वायु का अनुबन्ध समझना चाहिये ॥ १७१-१७३ ॥ शिथिलं श्वेतपीतं च विट् स्निग्धं गुरु शीतलम् । यद्यर्शसा घनं चासृक् तन्तुमत् पाण्डु पिच्छिलम् ॥ १७४ ॥ गुदं सपिच्छं स्तिमितं गुरु स्निग्ध च कारणम् । श्लेष्मानुबन्धो विज्ञेयस्तत्र रक्ताशसा बुधः ॥ १७५ ॥ यदि मल शिथिल (पतला), श्वेत या पीले रंग का, स्निग्ध, गुरु ओर शीतल हो, अर्श मे से निकलने वाला रक्त घना रेशे वाला, पाण्डु वर्ण ओर पिच्छिल (चिकासयुक्त) हो, गुदा पिच्छा (चिकास) से युक्त और स्तिमित हो, रोग का कारण गुरु आर स्निग्ध खानपान हो तो रक्तजन्य अशो मे कफ का अनुन्ध समझना चाहिये ॥ १७४-१७५ ॥ स्निग्धशीतं हितं वाते रूक्षशीतं कफानुगे । चिकित्सितमिदं तस्मात् सम्प्रधार्ये प्रयोजयेत् ॥ १७६ ॥ वायु के अनुबन्ध मे स्निग्ध और शीतल चिकित्सा, कफ के अनुबन्ध मे रूक्ष और शीतल चिकित्सा हितकारी है यह सोच कर कार्य प्रारम्भ करना चाहिये ॥ १७६ ॥ पित्तश्लेष्माधिकं मत्वा शोधनेनोपपादयेत् । स्रवणं चाप्युपेक्षेत लंघनैर्वा समाचरेत् ॥ १७७ ॥ अर्श मे पित्त-कफ की प्रधानता को देखकर प्रथम शोधन (विरेचन) करना चाहिये । अथवा लघन कराना चाहिये । बहते हुए दूषित रक्त की उपेक्षा करनी चाहिये, इसको रोकना नहीं चाहिये ॥ १७७ ॥ प्रवृत्तमादावर्शोभ्यो यो निगृह्णात्यबुद्धिमान् । शोणितं दोषमलिनं तद्रोगाञ्जनयेद्बहून् ॥ १७८ ॥ रक्तपित्तं ज्वरं तृष्णामग्निनाशमरोचकम् । कामलां श्वयथु शूलं गुदवंक्षणसंश्रयम् ॥ १७९ ॥ कण्ड्वूरुःकोठपिडकाः कुष्ठं पाण्ड्वामयं गदम् । वातमूत्रपुरीषाणा विबन्धं शिरसो रुजम् ॥ १८० ॥ स्तैमित्यं गुरुगात्रत्वं तथाऽन्यान्रक्तजान् गदान् । तस्मात्स्रुते दुष्टरक्तं रक्तसंग्रहणं मतम् ॥ १८१ ॥ जो वैद्य प्रथम अर्शों से बहते हुए दूषित रक्त को रोक देता है, वह मूढ है । क्योकि रोका हुआ दूषित रक्त बहुत से रोगों को उत्पन्न कर देता है।