भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

४२ चरकसंहिता [ अ० ३ गर्भा जायन्ते इत्यतोऽभिप्रत, इत्येवं सत्याजौरभ्र-मार्ग-मायूर-रस-गोक्षीर- दधि-घृत-मधु-तैल-सैन्धवेक्षु-रस-मुद्ग-शालिभृतानामेवैकान्तेन प्रजा स्यात्, श्यामाक-वरकोद्दाल कोरदूषक-कन्द-मूल-भक्ष्याश्च निखिलेनान- पत्याः स्युः, तच्चोभयमुभयत्रैव दृश्यते ॥ ६ ॥ गर्भ रस से भी उत्पन्न नहीं होता। यदि रस से उत्पन्न होता तो कोई भी स्त्री वा पुरुष बिना सन्तान के न रहते । ऐसा काई भी मनुष्य नहीं जो रसों का सेवन नहीं करता । यदि यह अभिप्राय है कि श्रेष्ठ रस सेवन करने वालों के ही सन्तान होती है तो बकरा, मेढ़ा, मृग, मोर, इनके मांस रस, गाय का दूध, दही, घी, शहद, तेल, नमक, गन्ने का रस, मूंग, शालि धान्य आदि से पुष्ट व्यक्तियों के ही सन्तान होवे और श्यामाक, वर, कोद्दालक, कोरदूषक, कन्द, मूल, फल आदि हीन धान्य खाने वाले सब बिना सन्तान के रहने चाहिये । परन्तु दोनों में दोनों बातें देखी जाती है ॥ ६ ॥ न खल्वपि परलोकादेत्य सत्त्वं गर्भमवक्रामति । यदि ह्येनमवक्रामेन् नास्य किंचिदेव पौर्वदेहिकं स्यादविदितमदृष्टं वा, न च किंचिदपि स्मरति ॥ १० ॥ तस्मादेतद् ब्रूमहे-अमातृजश्चायं गर्भोऽपितृजश्चानात्मजश्चासात्म्य- जश्चार सजश्च, न चास्ति सत्त्वमौपपादुकमिति होवाच भरद्वाजः ॥११॥ सत्त्व भी परलोक से आकर भी गर्भ में नहीं आता । क्योंकि यदि सत्त्व पर- लोक से आकर जन्म ग्रहण करे तो इस गर्भ को पूर्व जन्म की कोई भी बात अज्ञात और न देखी होनी चाहिये, प्रत्युत उसे पिछले जन्म की सब बाते ज्ञात रहना चाहिये । परन्तु वह पूर्व जन्म की कोई भी बात स्मरण नहीं रखता । इस- लिये सत्त्व भी कारण नहीं । इसी लिये हम कहते हैं कि गर्भ न माता से, न पिता से, न आत्मा से, न सात्म्य से, न रस से उत्पन्न होता है और न सत्त्व ही इसका उत्पत्ति कारण है ॥ ११ ॥ नेति भगवानात्रेयः, सर्वेभ्य एभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भोऽभि- निवर्त्तते ॥ १२ ॥ मातृजश्चायं गर्भः । न हि मातुर्विना गर्भोपपत्तिः स्यान्न च जन्म- जरायुजानाम् । यानि खल्वस्य गर्भस्य मातृजानि यानि चास्य मातुतः सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा—त्वक् च लोहितं च मांसं च मेदश्च नाभिश्च हृदयं च क्लोम च यकृच्च प्लीहा च वृक्कौ च बस्तिश्च पुरीषाधानं चाऽऽमाशयश्च पक्वाशयश्चोत्तरगुदं चाधरगुदं च क्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्रं च वपा च वपावहनं चेति मातृजानि ॥ १३ ॥