भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 576

५८२ चरकसंहिता [ अ० १५ अपने आप्य आदि गुणो को ही पोषण देते है। यथा—गुरु, खर, कठिन आदि पार्थिव गुण है, ये गुण शरीर के गुरु, खर, कठिन आदि भावो को ही बढाएगे गुरु आहार से शरीर मे गुरुता ही आयगी, खर आहार से शरीर मे खरता की ही वृद्धि होगी ॥ १४ ॥ सप्तभिर्देहधातारो धातवो द्विविधं पुनः¹ । यथास्वमग्निभिः पाकं यान्ति किट्टप्रसादतः ॥ १५ ॥ देह का धारण करने वाले सात धातु अपनी २ अग्नियो द्वारा दो प्रकार के पाक को प्राप्त होते है। (१) किट्ट और (२) प्रसाद ॥ १५ ॥ रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदस्ततोऽस्थि च । अस्थ्नो मज्जा ततः शुक्लं शुक्राद् गर्भः प्रसादजः² ॥ १६ ॥ प्रसादज धातु—रस से रक्त, रक्त से मास, मास से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा, मज्जा से शुक्र और शुक्र से गर्भ की उत्पत्तिहोती है³ । (१) खलेकपोतन्याय—दाना बिखेर देने पर जिस प्रकार से बहुत से कबूतर आकर बैठते हे और दूर या निकट जाने की अपेक्षा स्वय चुग कर चल पड़ते है उसी प्रकार से एक ही काल मे सब धातुओ का पोषण आहार रस से होता है। (२) केदार-कुल्या-न्याय—अर्थात् रस ही उत्तरोत्तर धातुओ को आप्लावित करता है। जिस प्रकार कुल्या (खेत की नाली), प्रथम क्यारी को सींच कर अगली क्यारी मे चली जाती है इसी प्रकार से रस भी आगे जाता है। (३) क्षीर-दधिन्याय—जिस प्रकार से सम्पूर्ण दूध दही मे बदल जाता है, इसी प्रकार से सम्पूर्ण रस रक्त रूप मे परिणत होता है, रक्त मास में इसी तरह। (४) उत्तरोत्तर धातुओ की वृद्धि—पूर्व धातु रस उत्तर धातु रक्त को बढ़ाता है। रस का प्रसाद भाग (सूक्ष्म भाग) रक्त को बढ़ाता है, रक्त का प्रसाद (सूक्ष्म भाग) मास को बढ़ाता है इसी प्रकार मे आगे ॥१६॥ रसात्स्तन्यं स्त्रिया रक्तमसृजः कण्डराः सिराः । मांसाद्वसा त्वचः षट् च मेदसः स्नायुसंभवः ॥ १७ ॥ उपधातु—रस से स्त्रियों मे स्तन्य (दूध) और आर्तव तथा रक्त से कण्ड- राये और शिराये (नाड़िया), मास से वसा और छः त्वचाये और मेद से स्नायु की उत्पत्ति होती है ॥१७॥ १ ‘द्विविधाश्च पुनःपुनः’ इति । २ ‘प्रजापते’ इति च पाठः । ३. धातुओं की उत्पत्ति प्रसाद भाग से ही है। रस से अगले धातु किस प्रकार बनते हैं, इसमे तीन मत हैं।