भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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६०६ चरकसंहिता [ अ० १५ (४) वातजन्य ग्रहणी मे पेया और दीपनीय योगो से जब आम का परि- पाक हो जाये तब वैद्य को चाहिये कि सूत्रस्थान मे कहे ( चतुर्थ ) दीपनीय औषधियो से साधित घृत को थोड़ा थोड़ा करके देवे ।। ७७ ।। किञ्चित्सन्धुक्षिते त्वग्नौ सक्तविण्मूत्रमारुतम् । द्वयहं त्र्यहं वा संस्नेह्य स्विन्नाभ्यक्तं१ निरूहयेत् ॥ ७८ ॥ (५) घृत के प्रयोग से जब अग्नि कुछ प्रदीप्त हो जाये तो यदि रोगी के मल, मूत्र ओर आयु रुके हो तो दो या तीन दिन घृत पान कराना चाहिये और रोगी को स्वेदन तथा तैल का अभ्यग देकर आस्थापन कराना चाहिये ॥ ७८ ॥ तत ऐरण्डतैलेन सर्पिषा तैलवकेन वा । सक्षारेणानिले शान्ते स्रस्तदोषं विरेचयेत् ॥ ७६ ॥ ( ६ ) इस प्रकार से जब वायु शान्त हो जाये और दोष ढीले हो जाएँ तब एरण्ड तैल से अथवा यवक्षारयुक्त तिल्वक घृत से रोगी को विरेचन देना चाहिये ॥ ७६ ॥ शुद्धं रूक्षाशयं बद्धवर्चसं चानुवासयेत् । दीपनीयाम्लवातघ्नसिद्धतैलेन मात्रया ॥ ८० ॥ ( ७ ) रोगी के आशय और पक्वाशय जब शुद्ध हो जाये, तथा कोष्ठ या आशयों मे रूक्षता अनुभव होने पर, मल के बँध जाने पर अनुवासन देना चाहिये । इसके लिये दीपनीय अम्ल तथा वात-नाशक ओषधियों से तैल सिद्ध करके मात्रा मे अनुवासन देना चाहिये ॥ ८० ॥ निरूढं च विरिक्तं च सम्यक् चैवानुवासितम् । लध्वन्नप्रतिसंयुक्तं२ सर्पिरभ्यासयेत्पुनः ॥ ८१ ॥ जब रोगी को निरूह बस्ति, विरेचन और अनुवासन भली प्रकार से दिये जा चुके तब पेया आदि लघु अन्न का भोजन करने वाले रोगी को घृत का पुन. धीरे धीरे अभ्यास कराना चाहिये ॥ ८१ ॥ द्वे पञ्चमूले सरलं देवदारु सनागरम् । पिप्पलीं पिप्पलीमूलं चित्रकं हस्तिपिप्पलीम् ॥ ८२ ॥ शणबीजं यवान्कोलान्कुलत्थान्सुरभींस्तथा । पाचयेदारनालेन दध्ना सौवीरकेण वा ॥ ८३ ॥ चतुर्भागावशेषेण पचेत्तेन घृताढकम् । १. 'द्वित्रीण्यहानि सस्नेहं स्नेहाभ्यक्त' इति पाठान्तरम् । २. 'सभुक्तः' इति पाठान्तरम् ।