भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 592

६०८ चरकसंहिता [ अ० १५

(६) त्र्यूषणाद्य घृत--त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पिप्पली) और त्रिफला
(हरड़, बहेड़ा, आवला) मिलित एक पल, गुड़ १ पल इस कल्क से गाय
का घृत ८ पल लेकर यथाविधि पाक करना चाहिये । इ० घृत को उचित मात्रा
मे (आधा ताला) मन्दानि वाले रोगी को पीना चाहिये ॥ ८७ ॥
पञ्चमूलाभयाजाजीपिप्पलीमूलसैन्धवैः ।
विडङ्गरद्व्यूपणशटीरास्नाक्षारद्वयैर्घृतम् ॥ ८८ ॥
शुक्तन मातुलुङ्गस्य स्वरसेनाईकस्य च ।
शुष्कमूलककोलाम्बुचुक्रिकादाडिमस्य च ॥ ८६ ॥
तक्रमस्तुसुरामण्डसौवीरकतुषोदकैः ।
काञ्जिकेन च तत्पक्वमग्निदीप्तिकरं परम् ॥ ६० ॥
शूलगुल्मोदरश्वासकासानिलकफापहम् ।
(१०) पचमूलाद्य चूर्ण--पचमूल (बेल की छाल, सोनापाठा की छाल,
अरणी की छाल, गम्हारी की छाल, पाढल की छाल), अभया (हरड़), व्योष
^(सोंठ, मरिच, पिप्पली), वायविडंग, शटी ये दस द्रव्य, शुक्त, मातुलुग
(गलगल, बडा नीबू) का स्वरस ओर आर्द्रक का स्वरस ये तीन द्रव, ये सब
द्रव्य अलग अलग घृत के समान भाग मे लेने चाहिये । सूखी हुई मूली, बेर,
नागरमोथा, चुक्रिका (चांगेरी) ओर अनार, तक्र, मस्तु, सुरामण्ड, सौवीरक,
काजी, तुषोदक और काजी इनसे घृत पाक करना चाहिये । इस पाकविधि मे
पचमूलादि दस द्रव्यो को ओर मूली, बेर, नागरमोथा इनको कल्क के रूप मे
बरतना चाहिये । यह घृत खूब अग्निवर्धक है । शूल, गुल्म, उदररोग, श्वास,
कास, वायु ओर कफ को नष्ट करता है ।। ८८-६० ।।
सबीजपूरकरसं सिद्धं वा पाययेद् घृतम् ॥ ६१ ॥
सिद्धमभ्यञ्जनार्थं च तैलमेतैः प्रयोजयेत् ।
(११) अथवा बिजौरे के स्वरस में उपरोक्त घृत को सिद्ध करके पीना
चाहिये । इसमें भी पंचमूलादि दस द्रव्यो का कल्क रूप मे व्यवहार करना
चाहिये । पचमूलादि से सिद्ध तैल को मालिश के लिये प्रयोग करना चाहिये ।
इसमे तक्र, मस्तु, सुरामण्ड, काजी आदि का उपयोग करना चाहिये ॥ ६१ ॥
एतेषामौषधानां वा पिबेच्चूर्णं सुखाम्बुना ॥ ६२ ॥
वाते श्लेष्मावृते सामे कफे वा वायुनोद्धते ।
दद्याच्चूर्णं पाचनार्थमग्निसन्दीपनं परम् ॥ ९३ ॥
इति पञ्चमूलाद्यं घृतं चूर्णं च ।
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान) · पृष्ठ 592, कुल 616 में से · BharatKosha