चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१० चरकसंहिता [ अ० १५ अनार का रस मिला कर गोलिया बना लेनी चाहियें, ये गोलिया आम का परि- पाक करनी और अग्नि को बढ़ाती है ॥ ६६-६७ ॥ नागरातिविशामुस्तक्वाथः स्यादाकपाचनः । मुस्तान्तकल्कः पथ्या वा नागरं चोष्णवारिणा ॥ ६८ ॥ देवदारुवचामुस्तनागरातिविषाभयाः । वारुण्यामासुतास्तोये कोष्णे वाऽलवणाः पिवेत् ॥ ६६ ॥ वर्चस्यामे सशूले च पिबेद्वा दाडिमाम्बुना । बिडेन लवणं पिष्ट्वा बिल्वं चित्रकनागरम् ॥ १०० ॥ सामे वा सकफे वाते कोष्ठशूलकरे पिवेत् । (१४) छः योग—(१) सोंठ, अतीस, मोथा इनका क्वाथ पीने से आम का पाचन होता है । अथवा (२) सोंठ, अतीस, मोथा, हरड़ या इनके सोंठ चूर्ण को गरम पानी से पीना चाहिये । (३) देवदारु, वच, मोथा, सोंठ, अतीस और हरड़ इनके चूर्ण को भवके मे खींच वारुणी के पानी के साथ पीना चाहिये अथवा (४) गरम पानी में नमक मिला कर पीना चाहिये, अथवा (५) अनार के रस के साथ पीना चाहिये । इससे कर्त्तन के समान पीड़ा और आमयुक्त मल नष्ट होता है । (६) आमयुक्त मल मे अथवा शूल होने पर बिड् (काला नमक), सैन्धा नमक, बेलगिरी, चीता और सोंठ इनको पीस कर अनार के रस के साथ पीना चाहिये ॥ ६८-१०० ॥ कलिङ्ग हिङ्ग्वतिविषावचासौवर्चलाभयाः ॥ १०१ ॥ (१५) यदि उदर मे शूल आम के कारण या वात मिश्रित कफ के का- रण से होती हो तो इन्द्रजौ, हींग, अतीस, बच, सौवर्चल (सचल नमक) और हरड़ इनके चूर्ण को अनार के रस के साथ पीना चाहिये ॥ १०१ ॥ छर्द्यर्शोग्रन्थिशूलेषु पिबेदुष्णेन वारिणा । पथ्यासौवर्चलाजाजिचूर्णं मरिचसयुतम् ॥ १०२ ॥ (१६) वमन, अर्श, ग्रन्थि-शूल मे—हरड़, सचल नमक, काला जीरा और मरिच इनके चूर्ण को गरम पानी से पीना चाहिये ॥ १०२ ॥ अभयां पिप्पलीमूलं वचां कटुकरोहिणीम् । पाठां वत्सकबीजानि चित्रकं विश्वभेषजम् ॥ १०३॥ पिबेन्निष्क्वाथ्य चूर्णानि कृत्वा कोष्णेन वारिणा । पित्तश्लेष्माभिभूतायां ग्रहण्यां शलनुद्वितम् ॥ १०४ ॥ (१७) पित्त-कफजन्य ग्रहणीरोग में यदि तीव्र शूल होरहा हो तो हरड़,