भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४७ याण्युपतप्यन्ते, बल हीयते, व्याधय आप्यायन्ते, यस्माद्धीन प्राणाञ्ज- हाति, यदिन्द्रियाणामभिग्राहक च मन इत्यभिधीयते, तत् त्रिविध- माख्यायते—शुद्ध राजसं तामसं चेति। येनास्य खलु प्रयतो भूयिष्ठ, तेन द्वितीयाया वाजातौ संप्रयोगो भवति, यदा तु तेनैव शुद्धेन संयुज्यते तदा जातेरतिक्रान्ताया अपि स्मरति, स्मार्तं हि ज्ञानमात्मनस्तस्यैव मनसोऽनुबन्धादनुवर्त्तते, यस्यानुवृत्ति पुरस्कृत्य पुरुषो जातिस्मर इत्युच्यते इति सत्त्वमुक्तम्। यानि खल्वस्य गर्भस्य सत्त्वजानि, यानि चास्य सत्त्वतः संभवतः संभवन्ति तान्यनुव्याख्यास्यामः, तद्यथा— भक्तिः शीलं शौचं द्वेष स्मृतिर्मोहस्त्यागो मात्सर्यं शौर्यं भयं क्रोधस्त- न्द्रोत्साहस्तैक्ष्ण्यं मार्दवं गाम्भीर्यमनवस्थितत्वमित्येवमादयश्चान्ये, ते सत्त्वजा विकाराः, तानुत्तरकालं सत्त्वभेदमधिकृत्य उपदेक्ष्याम इति सत्त्वजानि। नानाविधानि खलु सत्त्वानि तानि सर्वाण्येकपुरुषे भवन्ति, न च भवन्त्येककालम्। एकं तु प्रायोवृत्त्याऽऽह ॥ २० ॥ सत्त्व भी गर्भ की उत्पत्ति का एक घटक है। शुक्र-शोणित से बने गर्भ- शरीर में सब से प्रथम जीव का स्पर्श होता है। वहा सत्त्व (मन) ही स्पृक्- शरीर के साथ आत्मा को जोडता है। आत्मा तो निष्क्रिय है, वह 'सत्त्व' (मन) द्वारा ही देह में प्रवेश करता है। जिस के दूसरे देह में जाने के समय मरणासन्न रागी के स्वभाव में परिवर्तन आ जाता है, इच्छा बदल जाती है, सब इन्द्रिया पीड़ित होती हैं, बल क्षीण हो जाता है, रोग बढते है, जिनसे हीन होने पर पुरुष प्राणों को छोड़ देता है, जो इन्द्रियो को अपने अपने विषयो में प्रेरित करता है, उसीको 'मन' अर्थात् सत्त्व कहते हैं। [ जो शरीर आत्मा को नित्य स्पर्श किये रहता है वह शरीर 'स्पृक्' शरीर कहाता है। जिस सूक्ष्म देह में आत्मा एक देह से निकल कर दूसरे देह में प्रवेश करता है वह देह आत्मा का निरन्तर स्पर्श किये रहने से 'स्पृक्शरीर' कहाता है। उसका दूसरा नाम आतिवाहिक शरीर या कारण शरीर है। उस कारण शरीर द्वारा ही मन भोगायतन शरीर से आत्मा को बाधता अथवा स्पृक् शरीर स्पर्शवान् त्वचा से मढा यह स्थूल शरीर ही माना जाये। उसमें मन ही आत्मा से उस शरीर का सम्बन्ध बनाता है। यदि मन का इस आत्मा के शरीर से सम्बन्ध करने में कारण न माना जाये, तो आत्मा के व्यापक होने से सर्वत्र ही ज्ञान की उपलब्धि होनी चाहिये। परन्तु नहीं होती तो स्पर्शवाले शरीर में भी जिस जगह मन जुड़ता है वहा सुख दुःखादि की उपलब्धि होती