चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] शारीरस्थानम् ८३ ये वस्तुऐ सम्पूर्ण शरीर में वृद्धि करती है। निम्न बाते शरीर में बल की वृद्धि करती हैं। जैसे—बलवान् पुरुषों वाले देश में उत्पन्न होना, बलवान् माता पिता मे, बलवान् काल हेमन्त या शिशिर में उत्पन्न होना । साधारण समय का योग, बीज, शुक्र, क्षेत्र, आर्त्तव और गर्भाशय के उत्तम गुण, उत्तम गुणयुक्त आहार, उत्तम शरीर, उत्तम सात्म्य, उत्तम सत्त्व, स्वभाव से सिद्धि अर्थात् स्वभावतः शरीर की अष्टविध उत्तम बढ़ती वा बल को उत्पन्न करने वाले कर्म का सेवन, यौवनावस्था और व्यायाम आदि कर्म इनसे बल उत्पन्न होता है ॥ १२ ॥ आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—ऊष्मा वायु- क्लेद स्नेहः कालः समयोगश्चेति । तत्र तु खल्वेषामूष्मादीनामाहारप- रिणामकराणां भावानामिमे कर्मविशेषा भवन्ति । तद्यथा—ऊष्मा पचति, वायुरपकर्षति, क्लेदः शैथिल्यमापादयति, स्नेहो मार्दव जनयति, कालः पर्याप्तिमभिनिर्वर्त्तयति, समयोगस्त्वेषा परिणामधातुसाम्यकरः संपद्यते ॥ १३ ॥ निम्न बाते आहार को पचाने वाली हैं। जैसे—उष्णिमा, वायु, क्लेद, स्नेह, पाक काल और प्रकृति आदि आठ बातो का समयोग आहार सम्पत् को उत्पन्न करता है। आहार को भली प्रकार पचाने में उष्णिमा आदि निम्नलि- खित कार्य करते हैं। जैसे—उष्णिमा भोजन को पचाती है । वायु उष्णिमा से दूर स्थित भोजन को उष्णिमा के पास लाता है । क्लेद शिथिलता को उत्पन्न करता है। स्नेह कोमलता को पैदा करता है । समय तृप्ति को पैदा करता है । समयोग इनमें परिणाम तथा धातुओं की समता को उत्पन्न करता है ॥ १३ ॥ परिणामतस्त्वाहारास्थ गुणा शरीरगुणभावमापद्यन्ते यथास्वमवि- रुद्धाः विरुद्धाश्च विहन्युर्विहताश्च विरोधिभिः शरीरम् ॥ १४ ॥ आहार के परिपाक होने पर भोजन के गुण अपने समान शरीर के गुणों में बदल जाते हैं। जैसे—आहार का कठिन भाग मास, अस्थि आदि शरीर के कठिन भाग का पोषण करता है और द्रव भाग रक्त आदि रूप में बदल जाता है। शरीर गुणो के विरोधी आहार-गुण विरुद्ध गुणों को नष्ट करते हैं। इस प्रकार से नष्ट हुए गुण शरीर को नष्ट कर देते हैं । [जैसे—दूध और मछली आदि विरुद्ध आहार के कारण नष्ट हुए गुण शरीर को नष्ट कर देते हैं] ॥१४॥ शरीरधातवः पुनर्द्विविधाः संग्रहेण—मलभूताः, प्रसादभूताश्च । तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्य आबाधकराः स्युः । तद्यथा—शरीरच्छिद्रे- षूपदेहाः पृथग्जन्मानो बहिर्मुखाः परिपक्वाश्च धातवः प्रकुपिताश्च वात-