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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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पत्र की नयी इबारत बोली—"आलमपनाह, संभाजी ही मराठों का असली राजा है। वही शाहंशाह है। एक बार ऐसा ऐलान पूरे हिन्दुस्तान में करवा दें। शिवाजी की फौज में संभाजी को चाहने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं उन लोगों को यदि आपका संरक्षण मिला तो संभाजी खुश हो जाएगा। बाप-बेटे में एक बार झगड़ा शुरू हो गया तो अपने आप ही उग्र होता जाएगा। इस तरह मराठों में आपसी दरार पड़ेगी। एक बार इस दरार से यह प्रदेश बिखर गया तो उसकी तबाही करने में हमें कितना समय लगेगा!" जियाखान ने इस सिफारिश को नमक मिर्च लगाकर शम्भुराजा को सुनाया। किन्तु युवराज ने अपनी कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। वे अच्छी तरह समझ रहे थे कि शिवाजी महाराज के विरुद्ध भड़काने का यह षड्यन्त्र था। भूपालगढ़ के पास किये गये दिलेरखान के कुकृत्य का गहरा डर युवराज के मन में बैठ गया था। एक दिन दिलेरखान क्रुद्ध मुद्रा में युवराज के शामियाने में आया। उसके गुप्तचरों ने शिवाजी महाराज का एक पत्र प्राप्त कर लिया था। वह पत्र शम्भुराजा के सामने करते हुए दिलेरखान क्रुद्ध होकर युवराज से बोला "शिवाजी की अपने बच्चे के साथ व्यवहार करने की यह कैसी रीति है? "क्यों? क्या गलत कर दिया हमारे पिताजी ने?" शम्भुराजा ने प्रतिप्रश्न किया। "पढ़ो! पढ़ो न इस पत्र को। क्या आदेश दे रहे हैं वे किले के सुरक्षाकर्मियों को। संभाजी ने आक्रमण किया है तो शान्त मत बैठो। हर किले पर, किले के हर बुर्ज पर, तटबन्दी पर गोले दागो। अन्तिम समय तक किले को बचाने के लिए लड़ो। संभाजी राजा को हमारा बेटा मानकर किसी प्रकार का लिहाज मत करो। सुन लिया न आपने जन्मदाता की बात?" दिलेरखान के इस क्रोध पर शम्भुराजा खिन्नता से हँसे और बोले, "मेरे पिताजी ऐसा फरमान न निकालते तो और क्या करते? अपना बेटा शत्रु की फौज में जाकर मिल गया तो क्या प्रसन्न होकर उसके गले में रत्नों का हार पहनाएँ?" युवराज की इस प्रतिक्रिया पर दिलेरखान की जबान को ताला लग गया। चालाक और धूर्त दिलेरखान समझ गया कि शम्भुराजा की मनोदशा अब पहले जैसी नहीं रही। मुगल सेना में वे बहुत बेचैन थे। उसी रात जगकर दिलेरखान ने बादशाह के पास आधी रात को एक सन्देश भेजा। "जहाँपनाह मेहरबानी करो। संभाजी को शाहंशाह बनाने की शाही मंजूरी शीघ्र दीजिए। सल्तनत में इस तरह का फतवा जारी कीजिए। अपने एक पत्र से बाप-बेटे में भारी बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। मराठों की सल्तनत टुकड़ों में बँट जाएगी।" दिलेरखान शाही जवाब की व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा था। किन्तु उसे उधर 136 :: सम्भाजी