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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 793 में से

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एकदम घूम गया। मदिरा का प्याला खाली करते हुए मोरो दादा के साथ आये हुए कारकुन गला फाड़कर लगभग रो पड़े। “अण्णाजी, आपको सुरनवीसी न देकर शम्भुराजा ने बहुत बड़ा गुनाह किया है। “हाँ, अब राजधानी में हमारी धाक कहाँ रही? कुछ भी करना पड़े किन्तु पन्त के दिन बदलने चाहिए।” अण्णाजी को दुबारा न मिलने वाली 'सुरनवीसी' को शिष्यों ने स्मरण करा दिया। अण्णाजी दत्तो बेचैन हो गये। वे कठोर स्वर में बोले, “आजकल यहाँ न्याय-नीति से कोई लगाव ही नहीं रहा। साक्षी के लिए कहता हूँ। जाँच करके देखो, बताओ, कार्तिक सुदी सप्तमी, शक संवत् सोलह सौ एक के दिन, यह हमारा हिन्दवी स्वराज्य का दूसरा छत्रपति कहा गया था?” “कहाँ?” “केलशी के याकूब फकीर बाबा के मठ में। उसके पैरों में लोटने के लिए।” “इसमें क्या नयी बात है? यह फकीर तो शिवाजी महाराज का भी गुरु था। महाराज भी वहाँ अनेक बार...।” “हिरोजी, अरे मूर्ख! कहाँ वे महाप्रतापी शिवाजी और कहाँ यह शम्भू संकट? किसकी कहाँ और किससे तुलना करते हो? यार हिरोजी कहते हैं कि बुरा नहीं बोलना चाहिए किन्तु जब तक यह घमंडी, बदमिजाज राजा और उसी के जैसा कुपात्र कलुषा, रायगढ़ पर जीवित रहेंगे तब तक हम जैसे वफादार सेवकों का ठिकाना नहीं लगेगा। हमारे देश-धर्म पर आया यह शाक्त संकट समाप्त होने पर ही कल्याण होगा।” 238 :: सम्भाजी

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