छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके जोर से आवाज देने पर बालाजी चिटणीस चौंककर उठे। आँख मलते-मलते बाहर के दरवाजे तक आए। आँखों पर जोर देकर बालाजी पन्त ने अविश्वासपूर्वक सामने देखा। चिराग के उजाले में कारभारियों का चेहरा साफ नजर आ रहा था। वे सभी तुलसी वृन्दावन के पास ऐसे खड़े थे जैसे उनके पैर काँटों पर हों। चिटणीस की ओर देखकर अण्णाजी पन्त ने सूचित किया कि सोयराबाई ने उन्हें तत्काल बुलाया है। चिटणीस ने जल्दी-जल्दी जूते पहने। उन्होंने सोचा पन्हालगढ़ से राजा का कोई सन्देशा आया होगा। कोई-न-कोई आवश्यक कार्य अवश्य होगा। अन्यथा ये प्रधान लोग आधी रात को क्यों आते? चिटणिस ने कपड़े पहने। इसी बीच सोये हुए आवजी को भी अण्णाजी ने जगा लिया था। उन पिता-पुत्र को साथ लेकर सभी लोग शीघ्रता से महल के बाहर निकले। इन अधिकारी कर्मचारियों को इतनी रात गये दरवाजे पर देखकर पहरेदार डर गये। उनकी किसी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये बिना अण्णाजी ने उन्हें डाँटा— "ऐसे क्यों देख रहे हो? जाकर रानी साहब को उठाओ। उनसे कहो कि आपके आदेशानुसार सभी लोग आये हैं। सोयराबाई थोड़ी ही देर में बाहर आ गयीं। चिराग के प्रकाश मे उन्होने कर्मचारियों को देखा, बालाजी आवजी को भी ध्यान से देखा। दृश्य अविश्वसनीय था पर सच था। अण्णाजी दत्तो के चेहरे पर विजय का उन्माद छिप नहीं पा रहा था। सोयराबाई ने इस समझा। जब सभी पहरेदार और परिचारक बाहर चले गये तब उन्होंने दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया। मुँह का पसीना आँचल से पोंछते हुए बैठ गयीं। सोयराबाई ने एक बार पुनः सभी की ओर ध्यान से देखा और शीघ्रता से पूछा, "पन्त, इस बार तो आप सब एक मत होकर आये हैं न?" "महारानी, आप अब रायगढ़ की राजमाता होने वाली हैं। इस तरह डरने से कैसे चलेगा?" अण्णाजी ने शिकायत करना आरम्भ किया—"क्या कहें रानी साहब शिवाजी महाराज जैसे प्रतापी राजा के साथ हमने काम किया है। पर आजकल यहाँ राजधानी में इतनी गड़बड़ी मची हुई है कि क्या कहें? बहुत सह लिया। बहुत हो चुका। इसीलिए आपसे प्रार्थना है कि इस राज्य को आप बचा लें। राजाराम साहब को फिर से गद्दी पर बिठाएँ।" "पन्त जरा धीरे बोलिए।" "जाने दीजिए, हम किसी से डरते नहीं। जो भी होना है हो जाये।" अण्णाजी बहुत आवेश में आ गये थे। आँखों के सामने यह सब घटित होते देखकर बालाजी चिटणीस का सारा शरीर पानी-पानी हो गया। आवजी भी घबराकर अपने पिता की ओर टकटकी सम्भाजी :: 281