छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 34, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे-कम बोलने वाले और फूँक-फेंक कर कदम रखने वाले अण्णाजी आज अपनी भीतरी बेचैनी रोक नहीं पाये। वे शम्भूराजा की ओर देखते हुए शिवाजी महाराज से बोले, "महाराज फिरंगी गढ़ाई के रत्नहार बहुत सुन्दर होते हैं। इसीलिए पैसे भेजकर गोवा से मैंने दो हार मँगवाये थे।" "कुछ तो हम भी सुन चुके हैं।" महाराज ने कहा। "परन्तु उनकी गढ़ाई इतनी अच्छी निकली, शम्भूराजा को इतनी अच्छी लगी कि क्या बताऊँ? उन्होंने उन हारों को अपने पास रख लिया।" अण्णाजी ने स्पष्ट किया। अण्णाजी के तीरों के निशाने से शम्भूराजा तनिक भी विचलित न हुए। उन्होंने तत्काल अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की- "आप इसी क्षण पता करवा सकते हैं। वह चीज मैंने सरकारी रत्नशाला में जमा की है। उसकी रसीद हमारे पास है।" अण्णाजी एकदम चुप हो गये। सरकारी लिपिकों के चेहरे भी देखने लायक हो गये थे। शम्भूराजा की तरुणाई और उनका चुलबुला स्वभाव उन्हें चुप नहीं बैठने दे रहे थे। महाराज की ओर देखते हुए उन्होंने कहा- "पिताजी। आप ही हमेशा सबको बताते रहते हैं कि हमारे कर्मचारियों और सरदारों को दूसरे राजाओं के वकीलों और दीवानों का एहसानमन्द नहीं होना चाहिए। इसका परिणाम अपने राज्य के भीतर की कार्यप्रणाली पर होता है, राज्य को हानि पहुँचती है।" शम्भूराजा की बात समाप्त होने पर राहुजी सोमनाथ को जोर की खाँसी आयी। अन्य लोगों की स्थिति भी कुछ विचित्र सी हो गयी। शम्भूराजा की बात पर बड़े महाराज कुछ नहीं बोले। इससे सभी को बहुत आश्चर्य हुआ। दूसरे दिन शाम को अण्णाजी के घर पर शतरंज की बाजी खेली जा रही थी। राहुजी सोमनाथ को खेल के राजा, ऊँट और हाथी के बदले बाहर के गधे की याद आयी। सामने एक मोहरा रखते हुए वे बोले, "गधे के कान कभी लम्बे होने से कुछ नहीं बिगड़ता। लेकिन युवराज के कान लम्बे हो गये तो खतरा उत्पन्न करते हैं। करो रे करो। कुछ दवा दारू करो। वैद्य को बुलाओ।" इस बात पर अण्णाजी विषादपूर्वक हँसते हुए इतना ही बोले—"चलता है राहुजी! अनादिकाल से चलता आया है, कर्मचारी और सैनिक अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ उठाकर राज्य को बढ़ाते हैं। किन्तु थोड़े आराम के दिन आने पर वे जब खुली हवा खाने के मनसूबे बनाते हैं तो मन को मारना पड़ता है। उस समय तक सरलता से उपलब्ध सुख भोगने के लिए उत्तराधिकारी नाम के गुंडे राजमहल में तैयार हो ही जाते हैं। अपने भाग्य में ऐसा ही लिखा होगा तो हम क्या करेंगे?" 32 :: सम्भाजी