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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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टायर नाम टापू को जीतने के लिए उसने इसी तरह समुद्र में सेतु बाँधकर पराक्रम दिखाया था और युद्ध जीता था।'' अरब सूबेदार ने सिकन्दर का उदाहरण दिया तो सरदारों और राजाओं का भी उत्साह बढ़ा। हर रोज सामने वाली खाड़ी आठ सौ गज की दूरी पाटने के लिए बड़े बड़े पेड़ और पत्थर डाले जाते रहे। कपास से उन्हें जोड़े रखने का प्रयास किया गया। किन्तु समुद्र की क्रुद्ध लहरें पेड़ों और पत्थरों को निगल जाती थीं। पानी में डाला गया वृक्षों और पत्थरों का ढेर दूसरे दिन अपनी जगह पर दिखाई ही नहीं पड़ता था। घोर परिश्रम से किया गया कार्य पानी में बह जाता था। किन्तु शम्भुराजा अपने संकल्प को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। धीरे धीरे आसपास के गाँवो के लोग इस कठिन कार्य में सहभागी होने लगे। देखते देखते आधा सेतु तैयार हो गया। पानी की गहराई अधिक होने के कारण, बहुत से बड़े बड़े पत्थर अन्दर चले गये। किन्तु संकल्प और उत्साह की कोई सीमा नहीं थी। आधा सेतु बनते ही शम्भूराजा का उत्साह दुगुना हो गया। किन्तु दूसरी ओर से कलाल बांगड़ी और लांडा कासिम तोपें सेतु पर गोले फेंकने लगीं। शम्भूराजा ने भयानक और दादजी को आदेश दिया। पानी में दाई और बाई ओर फैली हुई जहाजों को इकट्ठा किया गया। ये समुद्री जहाज एक ओर शत्रु की तोपो का सामना कर रही थीं तो दूसरी ओर सैनिको और मजदूरों के लिए सुरक्षा कवच बन रही थीं। अब सिद्दी बन्धुओं ने सारी आशाएँ छोड़ दी थीं। किले में से सिद्दी का खजाना बाहर निकाला गया। उसके मूल्यवान वस्त्रों और आभूषणों को पेटियों में भरा गया। अब तक बहती हवा का रुख हब्शी सैनिकों को ज्ञात हो गया था। वे भीतर ही भीतर बहुत घबरा गये थे। दो तीन दिनों में ही किला गिरने वाला था। जजीरे की तटबन्दी पर मराठों की शहनाई और नगाड़े बजने वाले थे। शम्भूराजा की विजय के अन्तिम सोपान पर पहुँचने का समाचार आसपास के गाँवो में पहुँचने लगा था। गाँवों के लोग बड़े उत्साह से आगे आ रहे थे। प्रसन्नता की लहर खेतों और सिवानों में फैल रही थी। केवल दो दिन पहले सुबह सुबह कुछ सैनिक जंजीरे के पिछवारे से किले पर आये। उन्हें देखकर ठंडे पड़े हब्शियों में उत्साह आ गया। मराठों को लगा कि उनके पास कुछ रसद और गोला बारूद आ गया है। किन्तु शम्भूराजा की बेचैनी बहुत बढ़ गयी थी। शत्रु दल का यह उत्साह तात्कालिक नहीं था। उसमें किसी गम्भीर रहस्य का आभास मिल रहा था। उसी रात पन्द्रह बीस घोड़े हिनहिनाते हुए राजपुरी के तट पर पहुँचे। कोथलागढ के किलेदार ने राजा को आधी रात में जगाया। वह बडी घबराहट के सम्भाजी :: 377