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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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दिया, पुत्र की प्राप्ति हुई, ये सारी सुखद घटनाएँ हैं। "महाराज, इन सुखों के सामने इतना-सा दुःख क्या है?" "नहीं येसूराणी, हमारग दुःख थोड़ा नहीं है। कोंडाजी बाबा के लिए हम शोक मना ही रहे थे कि कर्नाटक-तमिल देश ने हमारी बगल में एक के बाद एक तीन छूरे भोंक दिये। काकड़े, काटकर और निम्बालकर ये हमारे तीनों सरदार साधारण नहीं थे। उनके निधन की पीड़ा हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है। हरजी जैसा आदमी भी वहाँ भयभीत हो जाता है। इस सब की एक ही दवा है—आक्रमण, केवल आक्रमण।" चिराग की रोशनी में शम्भूराजा की मुखमुद्रा बहुत लाल दिख रही थी। उनके सहयोगी एक दूसरे की ओर सहमकर देख रहे थे। येसूबाई ने साहस बटोरकर कहा, "परन्तु महाराज औरंगजेब जैसा शत्रु अपनी सेना लेकर वतन के सीने पर आ बैठा है। उसे यहाँ छोड़कर दूर कर्नाटक तमिल में जाना आत्मघात नहीं होगा क्या?" "नहीं महारानी, मैसूर का वह चिक्कदेवराज बहुत घमंडी हो गया है। वह इस अभिमान में फूला हुआ है कि उसे कोई छू नहीं सकता। अधिक समय तक शान्त बैठने का मतलब है अपने तीन सरदारों की मृत आत्मा के साथ गद्दारी करना।" बाहर लगातार वर्षा हो रही थी। नदी के किनारे ठंडी हवा बह रही थी। वर्षा रुक नहीं रही थी। रात बहुत हो चुकी थी। शम्भूराजा ने शान्त और धीमे स्वर में कहा, "कल औरंगजेब और हममें महायुद्ध होगा। तब कर्नाटक और तमिल से जो रसद हमें अपने अधिकार से मिलती है वही हमें आगे ले जाएगी। आगे कदम बढ़ाने से पहले हम मैसूर गये कान्हेरे की प्रतीक्षा करेंगे। निश्चित किया गया कि कान्हेरे के आने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाये।" नासिक बागलाण की ओर हंबीरराव को एक सन्देश भेजा गया। अन्य मुद्दों पर भी विचार-विमर्श किया गया। आधी रात बीत चुकी थी। लोगों की आँखें भारी हो गयी थीं। शम्भूराजा उठकर शयनकक्ष में चले गये। इसी समय ड्योढ़ी के पहरेदार दौड़कर अन्दर आये। जोर-जोर से शम्भूराजा से कहने लगे—"बाहर कृष्णाजी पन्त नाम का आदमी आया है। भीतर आकर राजा से मिलने का आग्रह कर रहा है।" शम्भूराजा की नींद उचट गयी। उन्होंने तत्काल कान्हेरे को अन्दर बुलाया। सभी की निगाहें उसी पर टिक गयीं। कान्हेरे वर्षा में पूरी तरह भीग चुके थे। उन्हें सर्दी भी लग रही थी। वे बिना रुके भागते हुए मैसूर से स्वराज्य में वापस आये थे। शम्भूराजा ने अपने कन्धे का शाल कृष्णाजी पन्त के हाथ में दी। कृष्णाजी ने अपने भीगे सिर को किसी प्रकार पोंछा। इसी समय शम्भूराजा ने प्रश्न किया— "कृष्णाजी पन्त, चिक्कदेवराजा क्या कह रहा है? हो गया कौल करार?" कृष्णाजी पन्त ने गर्दन झुका ली और नकार में सिर हिला दिया। शम्भूराजा ने सम्भाजी :: 399