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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 793 में से

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रसद से लदे पाँच सौ हाथी एक हजार बैल थे। लेकिन दिन में ही गड़बड़ी हो गयी। सीटियों से पूरा जंगल गूँजने लगा। बगल की घाटी में छुपे सात हजार मराठा सैनिक उस रसद पर टूट पड़े। दो घंटे तक घमासान लड़ाई हुई। जाहिर खान, फैजुल्लाखान जैसे अनेक मुगल अधिकारी मारे गये। अपनी रसद का मराठों द्वारा लूटा जाना सुनकर रामशेज के आसपास घेरा डाले मुगल सिपाही मदद के लिए दौड़े। घमासान लड़ाई हुई। लगभग छः सौ मराठा सैनिक मारे गये। दो हजार के आसपास जख्मी हो गये। परन्तु उन्होंने रसद का बहुत नुकसान किया था। मुगलों की विशाल सेना के सामने मराठा सेना पीछे हट गयी। इस अचानक हमले से मुगलों का कलेजा फट गया था। किन्तु इस छोटी-सी जीत से शरीफखान बहुत आनंदित हो गया। उसने अपने पराक्रम की बड़ाई का पत्र औरंगजेब के पास भेजा। असदखान को यह अच्छी तरह मालूम था कि रामशेज की विजय का समाचार सुनने के लिए बादशाह कितना आतुर है? उस पत्र सच्चाई को पक्का किये बिना ही वह दौड़ता हुआ गया। "बधाई हो मेरे मालिक बधाई हो। हमारी विजय हो गयी—रामशेज पर हमारी बड़ी जीत हुई है।" "विजय? कहाँ? किले पर या किले के नीचे?" असदखान गड़बड़ा गया। खिन्न स्वर में बोला. "जी हाँ, हुजूर! किले के नीचे तलहटी में।" बादशाह की भूरी आँखें इस तरह नाचीं, मान कह रही हों—'आप कितने मूर्ख हो?' उस समय वजीर को पसीना छूट गया। बादशाह ने विषाद के स्वर में कहा— "अपने बेवकूफ सेनाधिकारी मराठों के तरीके क्यों नहीं सीखते? मराठे किस तरह घूम-घूमकर आक्रमण करते हैं?" महीनों बीत गये किन्तु रामशेज हाथ नहीं आया। इसलिए बादशाह बहुत बेचैन था। शहाबुद्दीनखान भी हैरान था। किले पर थोड़ी सी ही सेना थी लेकिन अपना घोर प्रतिकार रोक नहीं रही थी। शहाबुद्दीन ने नयी रसद आने के लिए सभी रास्ते बन्द कर दिये थे। किले पर तोपें नहीं थीं फिर भी सूर्याजी पीछे हटने को तैयार नहीं था। किले में भैंसों-बैलों का चमड़ा इकट्ठा करके उन्होंने लकड़ी और चमड़े की तोपें बना ली थीं। इन तोपों का धमाका साधारण तोपों से दस गुना अधिक था। शहाबुद्दीन भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। किला जीतने के लिए नये-नये उपाय खोजने लगा। किले का मोर्चा तोड़ने के लिए ज़मीन से गोले दागना कारगर नहीं हो रहा था। इससे विजय मिलने वाली नहीं थी। यह अनुभव करके शहाबुद्दीन ने सभी लुहारों और बढ़इयों को एकत्र किया। बड़े बड़े वृक्षों को काटकर उसने एक 440 : सम्भाजी

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