छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 497, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंशान्त स्वर में कहा। बाघोली घाटी से बीच के रास्ते कवि कलश की सेना रायगढ़ की ओर जा रही थी। सामने दूरी पर रायगढ़ के पीछे की बुर्ज दिखाई पड़ रही थी। उस तरफ कर्मचारियों के आवास थे। अष्ट प्रधानों के आवास से कवि कलश की दृष्टि पोतले घाटी की ओर मुड़ी, गोवा और दक्षिण कोंकण की ओर बहुत दिनों तक रहकर घोड़े, हाथी आदि राजधानी की ओर आ रहे थे। स्पष्ट रूप से रायगढ़ दिखाई पड़ते ही सैनिकों और जानवरों की गति मन्द पड़ गयी। पाँच हजार की यह बड़ी फौज घूमते-घूमते आगे बढ़ रही थी। शम्भू महाराज दो दिनों में ही वहाँ पहुँचने वाले थे। राजधानी पर मुगलों के आक्रमण की भी आशंका थी। इसलिए महाराज ने कविराज को आगे भेज दिया था। कवि कलश ने सामने अचानक सामने धूल का गुबार देखा, तीन चार सौ घुड़सवारों का एक दल अतिशय वेग से सामने आकर पहुँच गया। कवि कलश शिलेदार मुरारी डाँगे दौड़ते हुए सामने आया और अपने घोड़े की लगाम खींचते हुए चिल्लाया, "कविराज, जल्दी कीजिए रायगढ़ पर मुगलों ने आक्रमण कर दिया है।" इन शब्दों के कान पर पड़ते ही कवि कलश का अलसाया हुआ शरीर एकाएक स्फूर्त हो गया। पीठ पर बिखरे अपने बालों को समेटकर उन्होंने गाँठ बाँधी। दूसरे ही क्षण अपने पाँव रिकेब में डालते हुए कविराज ने अपनी फौज के सम्मुख गर्जना की- 'चलोऽऽ आगे बढ़ोऽऽ हरऽहर महादेव'। एक के पीछे एक जानवर दौड़ने लगे। देखते-देखते पानी की लहर की तरह उस फौज ने पोतले की घाटी को पार कर लिया। घाटी के मुखद्वार पर आते ही दूसरी ओर का प्रदेश स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा। उसी समय कवि कलश ने अपने घोड़े को एड़ लगाई। एक क्षण में ही उनकी दृष्टि पाचाड़ और हिरकणी बुर्ज से होती हुई रायगढ़ के भव्य किले तक पहुँच गयी। किन्तु किले की तलहटी या प्रवेशद्वार के पाचाड़ के पास किसी प्रकार की गड़बड़ दिखाई नहीं पड़ रही थी। फिर कलश जी ने दूर गांगोली गाँव की ओर देखा। उस ओर आग की ऊँची लपटें दिखाई दे रही थीं। घास के गट्ठों और पुआलों के साथ-साथ घरों को जलाया जा रहा था। पूरे आसमान में धुआँ छा गया था। इसी समय मुरारी का घोड़ा दौड़ते हुए कवि कलश के घोड़े के पास पुनः आ गया। कलश ने कठोर स्वर में पूछा, "कौन है? कौन है वह शैतान?" "औरंगजेब का सरदार शहाबुद्दीन। पिछले चार पाँच दिनों से उसने मार काट और आगजनी शुरू कर रखी है।" "इतने दिन? रायगढ़ के इतने समीप पहुँचने की उसने हिम्मत कैसे की? चलो शत्रु को अभी अभी यहाँ से भगाएँगे।" सम्भाजी :: 495